गुरुवार, फ़रवरी 04, 2010

रेडियो पाकिस्तान उगलता है जहर


चंदन स्वप्निल
फिरोजपुर सेक्टर. पाकिस्तान रेडियो के लाहौर केंद्र से भारत विरोधी प्रसारण लगातार जारी है। रोज शाम सात बजे आधे घंटे तक प्रसारित होने वाले अपने कार्यक्रम पंजाबी दरबार में भारत के खिलाफ दुष्प्रचार करने के लिए यह केंद्र मीडिया के आंकड़ों या तथ्यों की गलत व्याख्या करने से भी परहेज नहीं करता।

पाकिस्तान की सोची-समझी साजिश:पिछले दिनों पाकिस्तान रेडियो के लाहौर केंद्र ने अपने इसी कार्यक्रम में पंजाब के युवाओं और किसानों को ड्रग पैडलर बनने के गुर सिखाए। बताया कि कैसे पाकिस्तान के रास्ते पंजाब में हेरोइन, स्मैक जैसे मादक द्रव्यों की तस्करी में मदद कर सकते हैं। इसके लिए बताया कि सीमा से सटे भारतीय गांवों के किसान किस तरह मजबूर हैं और नशे की चपेट में हैं। इसके पीछे रेडियो पाकिस्तान की सोची-समझी रणनीति है। भारत से संबंधित जिन तथ्यों का वह इस्तेमाल करता है वे इंटरनेट से जुटाए होते हैं और वह उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर सुनाता है।

बरनाला गांव के जमींदार सुरजीत सिंह ने बताया कि पाकिस्तान हमारे युवाओं को बरगला रहा है। दरअसल वह इस कार्यक्रम के जरिए यहां पर ड्रग पैडलरों की एक फौज खड़ी कर रहा है। वह हमारी खेती और मेहनत का लोहा मानने वाली दुनिया की नजर में हमारी छवि नशेड़ी के रूप में पेश करने में जुटा है। सभी को पाकिस्तान के असली चेहरे जानकारी है। पाकिस्तान कैसे मादक पदार्थो की तस्करी करवाता है, यह किसी से छिपा नहीं है। अब वह तस्करी के लिए भारत के युवाओं को भी बरगला रहा है।

विभाजन के समय कीर्तन सुनाते थे: विभाजन के समय इस क्षेत्र में एकमात्र रेडियो पाकिस्तान की ही पहुंच थी। तब इस पार के ग्रामीण लाहौर के प्रसारण को बड़े चाव से सुना करते थे। रोज शाम सात बजे पंजाबी दरबार कार्यक्रम में कीर्तन सुनाया जाता था। इसी से यहां के लोगों में रेडियो पाकिस्तान लोकप्रिय हो गया। बाद में भारतीय रेडियो केंद्र खुला और अमृतसर से कीर्तन का प्रसारण शुरू हुआ।

रविवार, जनवरी 31, 2010

क्या है बीटी बैंगन!


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बीटी बैंगन को लेकर इन दिनों काफी  पंगा चल रहा है. हमारी  सरकार विदेशी कंपनियों के दबाव में आकर इसे यहाँ बेचेनी पर उतारू है. इसका जबरदस्त विरोध चल रहा है. मोनसेंटो को कुश करने की कसरत है साडी. अभी तक कवल २५ देशों में ही इसे हरी झंडी मिलती है.आखिर यह बीटी बैंगन है क्या ? इस पौधे की हर कोशिका में एक खास तरह का जहर पैदा करने वाला जीन होगा, जिसे बीटी यानी बेसिलस थिरूंजेनेसिस नामक एक बैक्टेरिया से निकालकर बैंगन की कोशिका में प्रवेश करा दिया गया है। इस जीन को, तत्व को पूरे पौधे में प्रवेश करा देने की सारी प्रक्रिया बहुत ही पेचीदी और बेहद महंगी है। इसी प्रौद्योगिकी को जेनेटिक इंजीनियरिंग का नाम दिया गया है।
 मध्यप्रदेश के जबलपुर कृषि विश्वविद्यालय के खेतों में बीटी बैंगन की प्रयोगात्मक फसलें ली गई थीं। इस बात की जांच की गई कि इसे खाने से कितने कीड़े मरते हैं। जांच से पता चलता कि बैंगन में प्राय: लग सकने वाले 70 प्रतिशत कीट इस बैंगन में मरते हैं। इसे ही सकारात्मक नतीजा माना गया। अब बस इतना ही पता करना शेष था कि इस बीटी बैंगन को खाने से मनुष्य पर क्या असर पड़ेगा? प्राणियों पर भी इसके प्रभाव का अधकचरा अध्ययन हुआ है। ऐसे तथ्य सामने आए हैं कि बीटी बैंगन खाने वाले चूहों के फेफड़ों में सूजन, अमाशय में रक्तस्राव, संतानों की मृत्युदर में वृद्धि जैसे बुरे प्रभाव दिखे हैं।

 स्वतंत्र विशेषज्ञ माइक्रोबायोलॉजिस्ट डॉ. पुष्प मित्र भार्गव का कहना है कि स्वीकृति से पूर्व आवश्यक माने गए जैव सुरक्षा परीक्षणों में से अधिकांश को तो छोड़ ही दिया गया है। शायद अमेरिका की तरह हमारी सरकार की भी नीति है कि नियमन पर ज्यादा जोर न दिया जाए। वरना विज्ञान और तकनीक का विकास रुक जाएगा।
यह मंत्र बीज कंपनी मोनसेंटो ने दो दशक पूर्व तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश सीनियर को दिया था और उन्होंने उसे मान भी लिया था। तभी से उनकी नियामक संस्था एफडीए अपने भीतर के वैज्ञानिकों की सलाह के विपरीत अमेरिका में इस विवाद भरी तकनीक से बने मक्का, सोया आदि बीजों को स्वीकृति देते जा रही है और इन बीजों को खेत में बोया जा चुका है। अब अमेरिका के लोग इसकी कीमत चुकाने जा रहे हैं।
अमेरिकन एकेडमी ऑफ एनवायर्नमेंट मेडिसिन का कहना है कि जीएम खाद्य स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा है। विषाक्तता, एलर्जी और प्रतिरक्षण, प्रजनन, स्वास्थ्य, चय-अपचय, पचाने की क्रियाओं पर तथा शरीर और अनुवांशिक मामलों में इन बीजों से उगी फसलें, उनसे बनी खाने-पीने की चीजें भयानक ही होंगी। हमारे देश में इस विचित्र तकनीक से बने कपास के बीच बोए जा चुके हैं। ऐसे खेतों में काम करने वालों में एलर्जी होना आम बात है। यदि पशु ऐसे खेत में चरते हैं तो उनके मरने की आशंका बढ़ती है। भैंसे बीटी बिनौले की चरी खाकर बीमार पड़ी हैं। उनकी चमड़ी खराब हो जाती है व दूध कम हो जाता है। भैंस बीटी बिनौले की खली नहीं खाना चाहती। यूरोप और अमेरिका से खबरें हैं कि मुर्गियां, चूहे, सुअर, बकरी, गाय व कई अन्य पशु जीएम मक्का और अन्य जीएम पदार्थ खाना ही नहीं चाहते। पर हम इन्सानों की दुर्गति तो देखिए जरा।

इन पौधों से जमीन, खेत, जल जहरीला होता है, तितली, केंचुए कम होते हैं तो उन समस्याओं से निबटने के लिए कृषि विज्ञान का और विकास होगा, बॉयोटेकनोलॉजी में सीधा विदेशी निवेश और बढ़ेगा। हम इसी तरह तो विकसित होते जाएंगे! बीटी कपास के खेत के नजदीक यदि देशी कपास बोएं तो उसके फल मुरझा जाते हैं। ऐसा ही बैंगन के साथ भी हो सकता है। प्रकृति और किसानों ने हजारों साल में हजारों किस्म के बैंगन विकसित किए हैं, वह सारा खजाना जीएम बैंगन के फैलने से खत्म हो सकता है। साथ ही उनके औषधि गुण खत्म हो सकते हैं। खुद जीएम बैंगन की अगली पीढ़ियों में पता नहीं कौन से प्रोटीन बनेंगे और उनकी विषाक्तता और एलर्जी पैदा करने वाली ताकत, क्रिया क्या होगी? एक चिंता यह है कि अगर बीटी बैंगन बाजार में आया तो हम पहचानेंगे कैसे कि यह जीएम वाला बैंगन क्या है? आज भी किसानों को गलत और मिलावटी बीज बेचे जाते हैं। उन्हें तीन महीने बात ही पता चलता है कि वे ठगे गए हैं।
केंद्रीय  मंत्री जयराम रमेश इस विषय पर विभिन्न लोगों, विशेषज्ञों, संस्थाओं और सभी राज्य सरकारों की राय मांग रहे हैं। वे खुद भी जून महीने में कह चुके हैं कि मैं जीएम खाद्य के खिलाफ हूं। केरल और उड़ीसा की सरकारें अपने राज्यों को जीएम मुक्त रखना चाहती हैं। जयराम यहाँ भी गए वहां उनका भरी विरोध हुआ. मंत्री ने जीइएसी की स्वीकृति पर अंतिम निर्णय फरवरी 2010 तक लेने की घोषणा की है। यानी इस बारे में चिंता करने वालों के पास थोड़ा वक्त बाकी है।
पिछले चार साल में दुनिया भर के 400 कृषि वैज्ञानिकों ने मिलकर एक आकलन किया है।  उनका निष्कर्ष है कि समाधान जेनेटिक इंजीनियरिंग या नेनो टेक्नॉलाजी जैसे उच्च प्रौद्योगिकी में नहीं है। समाधान तो मिलेगा छोटे पैमाने पर, पर्यावरण की दृष्टि से ठीक खेती में।

बंजर होती जमीन को फिर बनाया


Swapnil जिस 30 एकड़ जमीन को प्रीतपाल के पिता बलदेव सिंह पिछले पचीस सालों से जोत रहे थे, उसने पिछली सदी का अंत आते-आते अन्न उगलना लगभग बंद कर दिया था। अमृतसर के खू हलवाइयां गांव में 1976 में जहां 10-15 फीट पर पानी मिल जाता था वहीं 2004 में 40 गहरे बोरिंग से भी बमुश्किल जरूरत भर पानी मिल रहा था।


उस साल एक एकड़ जमीन से मात्र दो क्ंिवटल धान मिला। उसने अमृतसर स्थित पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी (पीएयू) के कृषि विज्ञान केंद्र और फार्म सलाहकार सेवा केंद्र की मदद ली। भूमिगत पानी और मिट्टी के टेस्ट कराने पर पाया गया कि पानी ठीक था लेकिन भूमि क्षारीय।


Field पीयूए वैज्ञानिकों की सलाह पर उसने अपने खेत में प्रति एकड़ पांच टन जिप्सम दो किस्तों में डाला। भरपूर पानी लगाया ताकि जिप्सम मिट्टी के निचले स्तर तक पहुंच सके। इसके बाद देसी रुड़ी खाद और हरी खाद डाली। यह एक साथ मिलकर एसिड का निर्माण करती हैं और क्षारीय जमीन की उर्वरा शक्ति को वापस लाती है।


दो साल तक यह प्रक्रिया दोहराने से धान उत्पादन में थोड़ा इजाफा हुआ। इसके बाद गेहूं की बिजाई की। चार साल बाद उसके प्रति एकड़ खेत में बारह क्विंटल धान पैदा होने लगा। अभी प्रीतपाल ने वरसीम (पशुओं का चारा), तौरी, सरसों और गेहूं की बिजाई की है। वह और मेहनत करके अपने खेतों में सब्जियां और विविध तरह की फसलें बोकर पैदावार बढ़ाना चाहता है।


यहीं नहीं अभी उसे वरसीम और सरसों की फसल के दौरान मधुमक्खी पालन से करीब ढाई क्ंिवटल शहद मिल जाता है। बेहतर मिट्टी व पानी संरक्षण, पैसे और मानव श्रम का बेहतर इस्तेमाल और आधुनिक खेती के तरीकों को अपनाकर क्षार जमीन को उपजाऊ बनाने के लिए प्रीतपाल को तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के हाथों सम्मानित किया जा चुका है।


—प्रीतपाल सिंह : 098157-61741


चंदन स्वप्निल (डिप्टी न्यूज एडिटर, जालंधर) राजासांसी (अमृतसर) से

बेचारा मत कहना!


बारह साल की बच्ची के सिर से एक दिन अचानक मां-बाप का साया उठ गया। करीबी रिश्तेदार उसे सहारा देना तो दूर उसके घर पर कब्जा करने की कोशिश करने लगे। कोई और होता तो टूट ही जाता, लेकिन पर्ल जसरा किसी और मिट्टी की बनी थी। मामा की मदद से उसने न सिर्फ अपना घर बचाया बल्कि कच्ची उम्र में ही ठान लिया कि वह किसी भी दूसरे अनाथ बच्चों को बेसहारा, रोने के लिए नहीं छोड़ देगी। 17 साल की उम्र में ही उसने दो बच्चियों को अपनाया।

सात साल पूरे होते उसका कुनबा 120 तक पहुंच गया है। पर्ल के घर पर शाम चार से सात बजे तक पास की झुग्गी-झोपड़ियों से आने वाले बच्चे जुटने लगते हैं। वह इनके साथ थोड़ा ज्ञान और ढेर सारा प्यार बांटती है। चार महीनों से पर्ल के पास आ रहा लगन कहता है, ‘दीदी के पास आकर टाइम पता ही नहीं चलता। मैं तो बस इन्हीं के साथ रहना चाहता हूं।’ शायद लगन को ज्यादा इंतजार न करना पड़े क्योंकि पर्ल जल्द ही अपने घर को ही स्कूल बिल्डिंग में तब्दील करना चाहती है।

अनाथ बच्चों के लिए यह जज्बा उसमें रातों-रात नहीं आया। जब अचानक चार माह के अंतराल में उसके माता-पिता दोनों ही नहीं रहे तो 12 साल की पर्ल को लगा कि जिंदगी बेमतलब हो गई। पर जिंदगी तो चलती रहती है। पर्ल के घर में काम करने वाली कृष्णा की गोद ली हुई 4 साल की बच्ची ने पर्ल का जीवन बदल दिया। वह बच्ची चल-फिर नहीं सकती थी। पर्ल की दिन-रात की सेवा ने बच्ची को न सिर्फ उसके पैरों पर खड़ा किया, बल्कि उसे चलना-फिरना और पढ़ना भी सिखा दिया। अब वह स्कूल जाती है।

अब यही उसका मिशन बन गया जो उसे दूसरों से अलग करता है। हां! रविवार को फुर्सत के क्षणों में वह ग्राफिक डिजाइनिंग व पेंसिल स्केचिंग से अपनी कल्पना को आकार देती है। बाकी समय वह एक एनजीओ के लिए काम कर आजीविका कमाती है जिसका बड़ा हिस्सा स्कूल में लगता है।

उसके काम से प्रभावित होकर बहुत से लोग उसे डोनेशन देते हैं। प्रधानमंत्री के भाई सुरजीत सिंह कोहली ने इस बार क्रिसमस पर्ल के घर पर उसके बच्चों के साथ मनाया, लेकिन जब उन्होंने दान देने के लिए चेकबुक निकाली तो पर्ल ने विनम्रता से कहा, ‘बच्चों को चंद लम्हों की खुशी देने के लिए शुक्रिया। दान तो मैं बाद में भी आप से ले सकती हूं’।

क्या उसे डर या अकेलापन नहीं सताता? अमृतसर निवासी 24 वर्षीय पर्ल जसरा कहती हैं- ‘भावनात्मक तौर पर पुरुष से ज्यादा मजबूत महिला होती है। मैं तो प्रकृति से जो भी ग्रहण कर रही हूं, उसे उसी को समर्पित कर इंसान होने का फर्ज अदा कर रही हूं।’

गुरुवार, दिसंबर 17, 2009

आग से खेल !

12/13/2009 8:46:07 AM    
संदर्भ : नये राज्य : shri harivansh ji

बचपन में मुहावरा सुना, आग से खेलना. आशय था, ऐसे संकट-सवाल, जो आग की तरह हैं, जलाने, नष्ट करने की क्षमता से संपन्न. उन सवालों से व्यक्ति, परिवार, समाज, देश और दुनिया बचे. फूंक-फूंक कर कदम उठाये. लोक अनुभव से निकले, इस मुहावरे में बरजने का भाव है. आगाह करने का, सावधान रखने का, ताकि कोई आग से मत खेले. नहीं तो जलना-भस्म होना नियति है.       

देश में अनंत ज्वलंत मुद्दे हैं. संकट और चुनौतियां हैं. पर हमारी राजनीति आग से ही खेलना चाहती है. लेकिन आग लगाना आसान है, बुझाना कठिन. नेता गद्दी, कुर्सी और सत्ता के लिए देश को तबाह करने पर तुले हैं. तेलंगाना बनाने की घोषणा हुई. बगैर सोचे-समङो. और देश में एक कठिन मुद्दा खड़ा हो गया है. पैशन और इमोशन (आवेग और भावना) से जुड़ा. एक भूल ने देश में नया बवंडर खड़ा कर दिया है.10 नये राज्यों की मांग दो दिनों के अंदर हो गयी है. कूचबिहार, बोडोलैंड, पूर्वाचल, बुंदेलखंड, विदर्भ, रायलसीमा, मिथिलांचल, तुलुनाडु. ये आठ हैं. अवध,  भोजपुर और न जाने कितने और राज्य चाहिए. मायावती ने उत्तर प्रदेश विभाजन की मांग कर दी है. जसवंत सिंह गोरखालैंड के प्रवक्ता बन गये हैं. ओड़िशा-छत्तीसगढ़ के पश्चिमी जिलों को मिला कर एक नये राज्य की मांग भी हुई है. कच्छ और राजस्थान के विभाजन की चर्चा भी हवा में है. क्या कभी किसी ने सोचा, यह मुल्क जा कहां रहा है? भाषाई आंदोलन, बाल ठाकरे की मराठी अस्मिता, अब राज ठाकरे का मराठी मानुष, भिंडरावाले का आंदोलन, अयोध्या प्रकरण, सांप्रदायिक सवाल, जातिगत मुद्दे जैसे सवालों से इस देश में समय-समय पर जो आग लगी, उससे मुल्क ने क्या सीखा? क्या इन भावात्मक सवालों (आग) से कोई सबक मिला? कितना झुलसा है, यह देश, जिस देश कि चौहद्दी पर बार-बार चीन अपनी ताकत का एहसास कराये, आतंकवाद की चुनौती लगातार बनी हो, पचासों करोड़ नितांत गरीब, किसी तरह जी रहे हों, प्रधानमंत्री के शब्दों में, जहां आजादी के बाद की सबसे बड़ी चुनौती नक्सल समस्या मौजूद हो, वहां एक नया पेंडोरा बॉक्स (भानुमती का पिटारा) खोलने के कदम को आप क्या कहेंगे ?       

12 दिसंबर की खबर है प्रतिबंधित उल्फ़ा के नेता परेश बरूआ ने फ़िर संप्रभुता की बात उठायी है. वे असम में जनमत संग्रह चाहते हैं. कश्मीर की आग, आज भी धधक रही है. वहां भी विदेशी ताकतें चाहती हैं, जनमत संग्रह हो. साठ के दशक में तमिलनाडु से ऐसी मांग उठी. उस आवाज से देश स्तब्ध था.             

राज्यों में भाषा, क्षेत्र, नस्ल, संस्कृति ओद की संकीर्ण निष्ठाएं गंभीर रूप ले सकती हैं. मधु लिमये ने चेताया था, आत्मनिर्णय के छद्म सिद्धांत का प्रचार करनेवाला सोवियत संघ टुकड़े-टुकड़े हो चुका है. पर क्यों इस मुल्क के राजनेता बार-बार आग में जलने को आतुर हैं ?       

तर्क यह है कि छोटे राज्य बनें. विकेंद्रीकरण हो. ताकि सुचारु शासन चले. यह सैद्धांतिक पक्ष है. आज यथार्थ क्या है? छोटे राज्य हों या बड़े राज्य, चलानेवाले महत्वपूर्ण हैं. अंगरेजी में कहते हैं- संस्था गढ़नी है, तो सबसे पहले ‘मैन’ (आदमी) चाहिए. आदमी से आशय काबिल लोग. सक्षम लोग. मूलत राजनीति में चरित्र चाहिए. चरित्र और सिद्धांत से रहित दलों की आजकल बाढ़ आ गयी है. किसी में कोई राष्ट्रीय सपना बचा नहीं है. न देश का. न समाज का. हां अपने उद्धार का सपना जरूर है, इसलिए परिवारों के दल बनाये हैं. ऐसे ही दल अगर छोटे राज्यों का भविष्य तय करेंगे, तो यह देश कहां पहुंचेगा? एक बार चंद्रशेखरजी से पूछा. वह अकेले थे. सन 2000 के आसपास. जनता पार्टीने घोषणा पत्र में कहा था कि वह छोटे राज्यों की हिमायती है. सत्ता का विकेंद्रीकरण चाहती है. 1978 में पार्टी ने यह माना था. फ़िर छोटे राज्य क्यों नहीं बने? वह खुद छोटे राज्यों का क्यों विरोध करते हैं? उन्होंने एक प्रसंग सुनाया. कहा, मोरारजी और चरण सिंह इच्छुक थे, छोटे राज्य बनाने के लिए. पर हमने विरोध किया. तब मोरारजी प्रधानमंत्री थे. चरण सिंह गृह मंत्री. चंद्रशेखरजी ने कहा, न आप पंडित जवाहरलाल नेहरू हैं, न चौधरी साहब, सरदार पटेल. न उस युग के तपे-तपाये नेता राज्यों में हैं. तब ’50 और ’60 के दशकों में भाषाई प्रांत बनाने में कितना खून-खराबा हआ ? विद्वेष फ़ैला ?  इस आग को, जब पंडितजी-पटेल जैस लोग नियंत्रित नहीं कर सके, तो क्या आप लोग कर पायेंगे? पहले यह तय कर लीजिए, तब कदम उठाइए. जयप्रकाशजी भी तब छोटे राज्यों के पक्षधर थे. चंद्रशेखरजी का यह तर्क सबको जंचा. बात आगे नहीं बढ़ी.       

अब स्थिति क्या हो गयी है? सत्ता में बैठने के लिए कोई भी समझौता? कोई भी मांग मान लेना? चंद्रशेखर राव के अनशन प्रसंग को गहराई से सोचा गया? कैसे गृह सचिव बयान देते हैं, और फ़िर वापस लेते हैं? क्या यही प्रक्रिया है? आंध्र में सड़कों पर अलग-अलग गुटों में जंग होने लगती है. वकीलों के बीच. नेताओं के बीच. और पूरा राज्य आंदोलित और अस्थिर हो जाता है. जब आंध्र बना, तब विशाल आंध्र की मांग हई थी. कहा गया कि मद्रास राज्य में तेलुगु भाषियों के साथ न्याय नहीं हो रहा है. पोट्टी श्रीरामुलु ने अनशन किया. मान लिया गया कि देश में शासन की इकाई भाषाई राज्य होंगे. और फ़िर आंध्र बना. अब वह आंध्र कितने हिस्सों में बंटेगा? एक ही समूह, जाति, भाषा, संस्कृति, पहचान के लोग हैं. अब क्या जाति पर, कुल या गोत्र पर और अंतत परिवार के आधार पर यह देश खंड-खंड होगा? याद करिए, संयुक्त महाराष्ट्र की बात उठी. गुजरात अलग हआ. आइक्या केरल की चर्चा हई. मलयाली भाषी लोगों के लिए राज्य बना. गुजरात और हरियाणा अस्तित्व में आये. 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग ने इसी आधार पर राज्यों को स्वरूप दिया. झारखंड में पलामू के वरिष्ठ पत्रकार थे, रामेश्वरमजी. उन्होंने अभियान चलाया. झारखंड के उस इलाके को केंद्रशासित अंचल बनाने का. आज तक चंडीगढ़ की समस्या नहीं सुलझ सकी. पंजाब आंदोलन में यह एक बड़ा मुद्दा था. क्या कुछ नहीं देखा पंजाब और इस मुल्क ने? आतंकवाद, एक प्रधानमंत्री की हत्या, राजीव-लोंगोवाल करार, पंजाब और हरियाणा के बीच के विवाद. महाराष्ट्र - कर्नाटक का दशकों पुराना सीमा विवाद. इसके लिए बना महाजन आयोग की रिपोर्ट. पंजाब सीमा विवाद पर शाह कमीशन की रिपोर्ट. किस ऐसे संवेदनशील मुद्दा को हमारे नेता सुलझा सके हैं? अनगिनत विवादास्पद और विस्फोटक रपटें पड़ी हैं. पुराने घावों और नासूर को मत हरा करिए. मामूली मुद्दों पर भी साहस के साथ कदम उठाने की कूवत नहीं है आज की राजनीति में, पर आग लगाने में माहिर हैं. पहले क्षेत्रीय दलों के नेताओं के पास भी राष्ट्रीय दृष्टि थी. आज प्रादेशिक दृष्टिकोण है. संकीर्ण दृष्टिकोण है. परिवार ही पार्टी है. ऐसे लोग क्या इस देश में आग बुझा पायेंगे? मधु लिमये ने लिखा था,       

‘ भारत की राष्ट्रीय एकता प्रदीर्घ प्रयत्नों के बाद साकार हई है. मेरी इच्छा है कि कोई काम ऐसा न किया जाये कि जिससे यह एकता खतरे में आ जाये.’्र्र्र्र       

‘ मैं विकेंद्रीकरण का समर्थक हं. लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हर मामले में केंद्र के पर काट कर उन्हें प्रांतिक स्वायत्तता के नाम पर राज्यों पर चिपकाना. अपने अधिकारों में जिला पंचायत, महानगरपालिका, नगरपालिका तथा ग्राम पंचायतों को साङोदारी देने के लिए राज्य सरकारें कहां तैयार हैं.’्र्र्र्र       

‘ अखिल भारतीय दल की विरूदावली क्यों? फ़िर केंद्र की भी क्या जरूरत है? इंका, जनता, माक्र्सवादी कम्युनिस्ट ओद दलों को बरखास्त कर, अकाली, द्रमुक, तेलगुदेशम, असम-गण परिषद ओद विशुद्ध प्रादेशिक दलों को ही रहने देना उचित होगा! पर ऐसा होने से भारतीय गणराज्य की वही दुर्गति होगी, जो मराठा साम्राज्य की हई थी.’       

तेलंगाना प्रकरण में एक नयी आवाज भी है. हैदराबाद को लेकर झगड़ा है. अगर बंटवारा हआ, तो यह शहर किसके पास रहेगा? भौगोलिक अधिकार तो तेलंगाना का है. पर इसे विकसित करने में पैसा लगाया है , अन्य तेलुगु भाषियों ने भी. चंडीगढ़ विवाद अब तक अनसुलझा है. 1946 में कलकत्ता को लेकर दंगे हए. इजरायली और फ़िलिस्तीनियों के बीच जेरूसलम को लेकर झगड़ा आज भी है. मुंबई पर राज ठाकरे हक जता रहे हैं. शहरों को लेकर यह झगड़ा क्यों होता है? इतिहास में संपन्न शहरों पर बाहरी हमलों की नजीर पहले भी है. चूंकि शहर, संपन्नता के प्रतीक हैं. वहां बड़ा कारोबार है, उद्योग-धंधा है. अवसर हैं. सपने हैं. इसलिए विवाद है. इस विवाद का हल है, पुरुषार्थ और कर्म.       

जुलाई में रोम जाना हआ था. वहां अगस्टस सीजर का एक बयान पढ़ा, मुङो रोम मिला, ईंट के शहर के रूप में, मैंने इसे जब छोड़ा, तो यह संगमरमर का शहर था. ईंट से संगमरमर की इस यात्रा के पीछे आशय उद्यम से है, परिश्रम से है, संकल्प से है, नया कुछ करने से है. झारखंड बनते ही रांची में भी नयी राजधानी बन रही थी. कहां है, वह आज सपना ? हां, रायपुर में जरूर नया रायपुर बन चुका है. आजाद भारत में कितनी नयी राजधानियां बनीं ? चंड़ीगढ़ और बहत बाद में गांधीनगर. हम छोटे-छोटे विकेंद्रित सुंदर शहर नहीं बना सकते, जहां उद्योग-धंधों के अवसर हों, शहरी जीवन हों? अब तो भारत के स्तर पर नगर विकास के लिए बड़ी राशि मिल रही है, केंद्र से. पुरुषार्थ, कर्म और श्रम से नयी मुंबई और नये हैदराबाद बन सकते हैं. हर राज्य में. पर ऐसे सोच के लोग राजनीति में हैं कहां? आज सुपरपावर चीन के मुकाबले भारत को खड़ा होना है, तो भारत को आग लगानेवाले नेता नहीं चाहिए. बल्कि स्टेट्समैन चाहिए. कितना संकट है, देश के सामने? ऊर्जा संकट, पर्यावरण संकट, घटता खाद्यान्न, कानून -व्यवस्था की आंतरिक चुनौतियां, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद वगैरह. प्रो आर्नल्ड टायनबी ने लिखा था, कोई भी सभ्यता अपनी चुनौतियों को हल करने का कितना सामथ्र्य रखती हैं, इसी आधार पर बढ़ती है. जब कोई सभ्यता अपनी चुनौतियों का हल न ढ़ंढ़ पाये, तो वह चूकने लगती है. क्या बाहरी चुनौतियां कम हैं कि घर के अंदर ही हमारे नेता आग लगाने लगे?
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मंगलवार, नवंबर 24, 2009

अभी क्यों आयी रिपोर्ट

लिब्राहन की रिपोर्ट इस वक्त क्योँ जारी की गए यह समझ से परे है। वोह भी तब जबकि आज हमारा देश आपने पुराने जख्मों को कुरादना नही चाहता। इस संसदिये सत्र में बजाई मधु कोड़ा या स्पेक्ट्रुम घोटाला पर चर्चा हो तो ऐसा नही हुआ, मुझे ऐसा लगता है सरकार ने इनसे अपना पीछा हटाने के लिये इस रिपोर्ट को लीक करवाया है। आज जब हम इतनी तरकी कर रहें हैं तो आज का युवा इन् धार्मिक उन्माद में ख़ुद को देखना नही चाहता।
बेहरहाल इस रिपोर्ट ने भाजपा को जर्रोर नयी संजीवनी दे डाली है, नकली पटेल लाल kरिशन आडवानी जो बिल्कुल ही हाशिये पर चले गए थे उनेहे एक नयी ज़मीन प्रदानकी है। अब वोह फिर से गरजने लगे हैं.

गुरुवार, नवंबर 19, 2009

कोम्पुटर पर अपनी आंख का रखो ख्याल

सूचना प्रोद्योगिकी के इस युग में कम्प्युटर तथा सूचना तकनीकी से जुड़े अधिकतर लोग लगातार कई घंटों तक कम्युटर पर कार्य करते रहते हैं, bahut एसे भी हैं जो शौकिया या व्यसनी तौर पर ही सही घंटों कम्प्युटर के सामने बैठे रहते हैं और बड़ी चाव से मॉनिटर को निहारते रहते हैं| सही तौर पर कहें तो हम कम्युटर के इतने आदी हो गए हैं की एक बार कम्युटर के सामने बैठ गए तो फिर वहां से हटने का ख्याल ही नहीं आता और घंटो आँखे गड़ाए बस मोनिटर को निहारते हुए कार्य करते रहते हैं| यह हमारी दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बन गया है, आज हम कम्युटर पर कार्य किये बिना दिन नहीं बिता सकते| कुछ न कुछ कार्य लगा ही रहता है, यदि कोई विशेष कार्य नहीं तो बस मौज मस्ती ही सही और हम जुट जाते हैं इन्टरनेट पर मटरगस्ती करने के लिए और जो एक बार इन्टरनेट की रह पकडी तो फिर अंत कहाँ!!! कुछ और नहीं तो कम्युटर पर विडियो गेम ही खेलने में मसगुल हो जाते हैं.... जो लोग कम्प्युटर के कार्य से जुड़े हैं जैसे की सॉफ्टवेर प्रोग्रामर तथा बीपीओ एवं कॉलसेंटर में कार्य करने वाले लोग तो १२-१५ घंटे कम्युटर मोनिटर से आँखे दो-चार करते रहते हैं...

लगातार कई घंटों तक कम्युटर को देखने से हमारी आँखों पर इसका बेहद ही बुरा प्रभाव पड़ता है जिसके परिणाम स्वरूप हमारी आँखे कमजोर हो सकती हैं जिससे हमारी आँखों पर नंबर वाले चश्में लगाना अनिवार्य हो जाता है| लगातार एक-टक मॉनिटर को निहारते रहने से हमारी आँखों को जरूरी विश्राम नहीं मिल पता तथा हमारी आँखों की पुतली सुखाने लगती है जो हमारी आँखों के स्वास्थ्य के लिए बिल्कुल भी अच्छा नहीं है| बस हमें कम्युटर पर कार्य करते समय नियमित रूप से थोडी थोडी अंतराल पर आँखों के सुरक्षा के लिए कुछ उपाय करते रहने चाहिए जो हमारी आँखों को रहत पहुँचाने के आलावा उनके स्वास्थ्य रहने में भी काफी कारगर सिद्ध होता है| कुछ उपाय जो हमारी आँखों को कमजोर पड़ने से बचायेंगे निम्नलिखित हैं, इनका पालन करके bahut हद तक आँखों को सुरक्षित रखा जा सकता है:

क्या करें:

1. कभी भी मॉनिटर को लगातार घूर-घूर कर नहीं देखना चाहिए, समय समय पर अपनी पलकों को झपकते रहना चाहिए|

2. हर १५-२० मिनट पर मॉनिटर की तरफ से अपनी नजर हटा कर कमसे कम २-३ मिनट के लिए किसी २०-२५ फीट दूर जगह पर ध्यान ले जाएँ और उस दौरान अपने गरदन को दायें-बाएँ घुमाते रहे|

3. हर ४०-५० मिनट पर अपने हाथों की हथेली को आपस में अच्छी तरह से रगड़ कर आँखों को हथेली से करीब १ मिनट तक ढके रहे इससे आँखों को काफी राहत मिलती है|

4. हर घंटे-दो-घंटे में अपने चहरे एवं आँखों पर पानी के छींटे मारें इससे आपको न सिर्फ ताजगी मिलेगी अपितु आपकी आँखों को भी राहत महसूस होगा और वे तरोताजा रहेंगे|

5. हर दो-घंटे के उपरांत कम से कम ५ मिनट के लिए कहीं टहलने के लिए निकल जाये इससे आप की आँखों को कुछ समय के लिए राहत मिला जायेगा| साथ ही साथ ऐसा करनें से आपके कमर, कंधे एवं रीढ़ की हड्डी का भी कसरत हो जायेगा|

6. कम्प्युटर पर कार्य करते वक्त हो सके तो हर संभव एंटीग्लेअर चश्मा जरूर ही पहनें, इससे मॉनिटर से निकलने वाली विकिरणों से हमारे आँखों की सुरक्षा होती है|

7. अपनें भोजन में एसे फल एवं सब्जिओं का प्रयोग करे जिससे आँखों को पोषण मिल सके, जैसे की रोज कम से कम एक गाजर जरुर खाएं|

8. हफ्ते में एक बार आँखों में सुरमा या काजल लगायें इससे आँखों को काफी राहत मिलाता है| आप आँखों में शुद्ध शहद या नेत्रप्रभा भी लगा सकते हैं| आँखों में कोई भी दवा लगाते समय सफाई का ध्यान देना बेहद आवश्यक है|

9. आँखों में लगातार ज्यादा दर्द, जलन या चुभन हो तो तुंरत ही नेत्र विशेषज्ञ से मिलें| वैसे भी समय समय पर आँखों की जांच करवाते रहना चाहिए|

क्या न करें:

1. आँखों में दर्द होने पर या आँखों में कुछ गिर जाने पर कभी भी आँखों को जोर जोर से न रगडें, बल्कि अपनी पलकों को तेजी से झपकें इससे आँखों में अंशु आ जायेंगे जो आँखों के लिए अमृत से कम नहीं हैं, आँशु आने से आँखों में पड़ी गन्दगी भी आँशु के साथ बह कर निकल जायेगी|

2. घुर-घुर कर या टक- टकी लगाकर एवं लम्बे समय तक मॉनिटर को न देखें|

3. बिना साफ़ किये हाथों या कपडे से आँखों को न पोछें|

4. बिना विशेषज्ञ के परामर्श के आँखों में कोई भी दवा या आई-ड्राप न डालें|

5. आँखों को धुल-मिटटी के संपर्क में आने से बचाएं|

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