बुधवार, मई 09, 2012

बैरिस्टर से महात्मा बना दिया इस अफ्रीकी जेल ने


अभिजित मिश्रत्न सेल नंबर-4, कांस्टीट्यूशन हिल्स (जोहांसबर्ग)।

नीचे उतरती सीढिय़ों की छत पर लिखा है - जब तक आप जेल में न रहे हों, आप उस देश की सही तस्वीर नहीं जान सकते।
दो कदम नीचे उतरता हूं। संदेश का अगला हिस्सा - किसी देश की पहचान इससे नहीं होती कि वह अपने विशिष्ट नागरिकों के साथ कैसा सलूक करता है, बल्कि देखना यह चाहिए कि वह निचले पायदान पर खड़े व्यक्तियों से कैसा बर्ताव करता है।
सीढिय़ां खत्म होने को हैं। संदेश की अंतिम लाइन - और दक्षिण अफ्रीका ने अपने अफ्रीकी नागरिकों के साथ ऐसा सलूक किया, जैसे वे जानवर हों। संदेश के अंत में 
लेखक का नाम दर्ज है- नेल्सन मंडेला।
जोहांसबर्ग की ब्रामफोटेंन पहाड़ी पर बने ओल्र्ड फोर्ट प्रिजन कांघ्लेक्स की जिन सीढिय़ों का जिक्र हो रहा है वो सीधे सेल नंबर - 4 को जाती हैं, जहां एक बैरिस्टर के महात्मा बनने की कहानी खाली बैरकों में आज भी गूंज रही है। आज यह किला कांस्टीट्यूशनल हिल्स कोर्ट कांघ्लेक्स में तब्दील हो चुका है, लेकिन इसके काफी बड़े हिस्से को बतौर विरासत पुराने स्वरूप में कायम रखा गया है। यह हिस्सा सेल नंबर 4-5, वीमेंस सेल व अवेटिंग ट्रायल बिल्ंिडग को समेटे हुए है। धडक़ते दिल से चार नंबर सेल में प्रवेश करता हूं, जिसके दरवाजे पर अब किसी ने लिख दिया है - लाइफ इन ए सेल। कमरे की फर्श पर रोल किए हुए कुछ बिस्तर ऐसे पड़े हैं, मानो कैदी लेटे हुए हैं। एक कोने में एक फुट की आड़ में शौचालय है। इस सेल के ठीक सामने वाली कोठरी में अब पुराने कैदियों की बड़ी-बड़ी तस्वीरें लगा दी गई हैं। एक सवाल के साथ - हू इज द क्रिमिनल। एक तस्वीर हमारे बापू की भी है। कसूर भी दर्ज है - अश्वेत लोगों के साथ भेदभाव करने वाले कानून के खिलाफ अहिंसात्मक आंदोलन का नेतृत्व! बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी को यहां 1908 से 1913 के बीच किस्तों में सात महीने दस दिन की सजा काटनी पड़ी।
भेदभाव की इंतहा घ् 1902 से 1904 के दौरान खास तौर पर अश्वेत कैदियों के लिए बनाए गए सेल नंबर 4-5 में बापू ने जो देखा-जो झेला, उसका अंदाजा इतिहास में दर्ज हो चुके कैदियों के बयानों से लगाया जा सकता है। 907 कैदियों की क्षमता वाले सेल नंबर 4-5 में 2200 से 'यादा कैदी ठूंस दिए गए थे। जिन कोठरियों में अधिकतम 30 कैदियों को रखा जाना था, वहां 60 कैदियों को दिन के 23 घंटे बिताने पड़ते थे। गोरे कैदियों को एक दीवान, एक मैट्रेस, एक पिलो, तीन कंबल, चार चादरें, दो पिलो कवर व एक बिछौना दिया जाता था। वहीं अश्वेतों को सिर्फ दो चटाई व तीन फटे-पुराने कंबलों से संतोष करना पड़ता था। इतना ही नहीं, खाने में भी जमीन आसमान का अंतर रखा जाता था। अश्वेत कैदियों को मांस के नाम पर सड़ी-गली उबली मछलियां दी जाती थीं, जिसकी बदबू उल्टियां करने पर मजबूर कर देती थी। खाना इतनी देर में मिलता था कि आंतें कटने लगती थीं और फिर वह बदबूदार खाना भी नियामत जैसा लगता था। ये खाना भी टीन की निहायत गंदी जूठन लगी घ्लेटों में परोसा जाता था। इंसानों के साथ जानवरों जैसे सलूक के ऐसे कई किस्से दीवारों पर चस्पा हैं।
दिन-रात जुल्म घ् रंगभेद चरम पर था। पुलिस दिन व रात में कई बार अश्वेत कैदियों के पास पहुंचती थी। उन्हें पूछताछ के बहाने पीटा जाता था। फिंगर प्रिंट लिए जाते थे। गर्मी हो या जाड़ा, नंगा करके तलाशी ली जाती थी। यहां तक कि जेल वार्डन उन्हें घुटनों के बल झुका कर सुनिश्चित करते थे कि कहीं उन्होंने गुदा में कुछ छिपा तो नहीं रखा है। कुछ युवा कैदियों के यौन उत्पीडऩ के किस्से भी यहां दर्ज हैंं। विरोध करने वाले कैदियों को काल कोठरी (डीप डार्क होल) में महीने भर के लिए फेंक दिया जाता था। खाने के नाम पर सिर्फ उबले चावल का पानी। इन सेल में रोशनी व हवा का कोई इंतजाम नहीं होता था। जेल अफसर कालकोठरी का इस्तेमाल कैदी का मनोबल तोडक़र उन्हें नए कानून के सामने झुकने पर मजबूर करने के लिए करते थे। लेकिन, सलाम उस ज'बे को। ये काल कोठरियां कैदियों के जुनून को परवान चढ़ाने लगीं। कैदी यहां विरोध के नारे और गीत गाने लगे। चलते-चलते जेल की दीवारों को सहलाता हूं। अजीब का रोमांच होता है। आखिर कुछ तो रहा होगा इन पत्थरों में जिन्होंने एक दुबले-पतले साधारण से इंसान में फौलाद भर दिया। बाहर आने के बाद भी जैसे कानों में बापू के शब्द गूंज रहे हैं - ...मैं इसका जवाब जरूर दूंगा। मैं अपना संदेश अपने लोगों तक हर हाल में पहुंचाउंगा। उत्पीडऩ का यह दंश मेरे बहुंत भीतर तक उतर गया है। यह बाहर नहीं निकलेगा। अब जो रास्ता मुझे दिखाई दे रहा है, मुझे उस रास्ते से कोई डिगा नहीं सकता...। जेल के बाहर हवा नम है, लेकिन आजादी के इन परवानों की स्मृति में जल रही आग की तपिश बरकरार।

गोरों की काली कहानी है रॉबेन आइलैंड


नेल्सन मंडेला की जेल का दौरा किया प्रतिभा पाटिल ने
अभिजित मिश्र रॉबेन आइलैंड (केपटाउन)।
... रॉबेन टापू आज उन सभी लोगों के लिए श्रद्धा का केंद्र है जो स्वतंत्रता व सम्मान के साथ जीने के अधिकार का समर्थन करते हैं। ये टापू रंगभेद के खिलाफ दक्षिण अफ्रीका के संघर्ष की कहानी को समेटे हुए है। ये विपरीत परिस्थितियों व निर्मम ताकतों पर मानवता की जीत का प्रतीक है। ये जगह हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता संग्राम के सिपाहियों को कैसे हालात का सामना करना पड़ा। दक्षिण अफ्रीका की आजादी के नायक नेल्सन मंडेला को यहां 17 साल कैद में रखा गय। इस टापू व मंडेला के सेल नंबर 5 का दौरा भीतर तक झकझोर रहा है। शक्ति, साहस व बलिदान की यह गाथा सदियों तक युवाओं को इंसाफ व आजादी की रक्षा करने के लिए प्रेरणा देती रहेगी।
राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने शनिवार को केपटाउन से करीब 11 किलोमीटर दूर रॉबेन आइलैंड की मैक्सिमम सिक्योरिटी जेल का दौरा करने के बाद विजिटर बुक पर अपने ये शब्द दर्ज कर दिए। वह यहां रंगभेद के खिलाफ अथक संघर्ष करने वाले नेल्सन मंडेला और उनके जैसे तमाम लोगों के दर्द से रूबरू होने आई थीं। दक्षिण अफ्रीका के पहले लोकतांत्रिक राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला  को यहां 17 साल तक 6 वर्ग मीटर की कोठरी में कैद रखा गया था। 11 फरवरी 1990 को रिहा होने से पहले मंडेला ने कुल 27 साल सलाकों के पीछे गुजारे। ब्रिटिश सरकार की रंगभेदी नीतियों व कानून के खिलाफ आवाज उठाने वाले अश्वेत लोगों के यातना केंद्र के रूप में बदनाम रहे रॉबेन टापू में पैन अफ्रीकन कांग्रेस के संस्थापक राबर्ट मैंगलिसो सोबुकवे ने भी लंबा वक्त गुजारा है।
बहुत झेला नेल्सन ने
इसी जेल में सात साल कैद रहे 46 वर्षीय स्पार्क मिलवाना अब इस हैरिटेज जेल के गाइड हैं। वे बताते हैं कि मंडेला को यहां जबरदस्त यातना झेलनी पड़ी। उन्हें छोटी से काल कोठरी में नंगे पैर 23 घंटे बिताने पड़ते थे। सिर्फ तीन कंबल और एक बाल्टी, यही सामान था उनकी कोठरी में। सघ्ताह में एक दिन उन्हें बाहर निकाला जाता था और चूना पत्थर की खदान में काम पर लगा दिया जाता। उनके हाथों से खून निकलने लगता और छाले पड़ जाते। डॉक्टर सघ्ताह में एक ही दिन आता था।
जबान पर भी लगाम
स्पार्क बताते हैं कि यहां जेल में बंद कैदी किसी से बात नहीं कर सकते थे। कोठरी के भीतर सेंसर लगा हुआ था, जरा भी आवाज होने पर कोठरी के बाहर लगा लाल रंग का बल्ब सायरन के साथ बजने लगता था। जेल अधिकारी आते और शुरू हो जाता यातना का नया दौर। कैदियों को उनके मूलस्थान, रंग व अपराध के आधार पर छांटा जाता था। सबसे खराब जिंदगी अश्वेतों की थी, जिन्हें कभी पूरे बाजू की शर्ट-पैंट व जूते-मोजे नहीं दिए जाते थे। एक बार रेडक्रास की टीम मंडेला से मिलने पहुंची तो उन्हें जबरन फुल पैंट व शर्ट पहना दी गई। अफ्रीका में 11 जबानें बोली जाती हैं, लेकिन यहां कैदियों को सिर्फ अंग्रेजी या अफ्रीकन में बोलने की इजाजत मिलती थी, ताकि जेल स्टाफ समझ सके। इसका उल्लंघन करने पर पीटना या भूखा रखना आम था। रॉबेन टापू को 1959 में जेल में तब्दील किया गया और 1961 से 1991 के बीच यहां 3000 से ज्यादा राजनीतिक कैदी बंद रहे। इस टापू का इस्तेमाल कुष्ठ रोगियों को भी रखने में किया गया, जिसके निशान आज भी यहां अलग कब्रिस्तान व चर्च के रूप में मौजूद हैं। इन रोगियों व उनके बच्चों के साथ भी अमानवीय सलूक किया जाता था।
जेल से बाहर निकली आत्मकथा
वर्ष 1983 से 2000 तक इसी जेल में बंद रहे स्पार्क याद करते हैं कि कैसे मंडेला ने जेल में रह कर अपनी आत्मकथा लिखी और उसे एक पेड़ के नीचे दबा दिया, लेकिन जेल अधिकारियों ने इसे खोद निकाला। बहरहाल, मंडेला इसकी एक प्रति मैक महाराज (सत्येंद्रनाथ रघुननन) तक पहुंचाने में सफल रहे, जो भारतीय मूल के व्यवसायी होने के साथ तत्कालीन परिवहन मंत्री भी थे। अधिकारियों ने इसे कोड ऑफ कंडक्ट का उल्लंघन माना और मंडेला को सजा भी मिली, लेकिन रेत मुट्ठी से निकल चुकी थी। मैक महाराज ने मंडेला की यह कहानी प्रकाशित करा दी, जो लांग वॉक टू फ्रीडम के नाम से बेस्टसेलर साबित हुई। जेल से रिहाई के बाद जब मंडेला राष्ट्रपति बने तो उन्होंने मैक महाराज के इस अहसान का बदला उन्हें दोबारा परिवहन मंत्री बनाकर चुकाया। उनके पदभार ग्रहण करने पर मंडेला ने कहा - ये मेरी तरफ से आपको सूचना परिवहन करने का तोहफा है। मैक इन दिनों राष्ट्रपति जैकब जूमा के आधिकारिक प्रवक्ता हैं।

राष्ट्रपिता के घर पहुंचीं राष्ट्रपति



महात्मा गांधी के संघर्ष की कालजयी गाथा है सर्वोदय
 अभिजित मिश्र डरबन (दक्षिण अफ्रीका)।
 सबके लिए खुशहाली और सम्मान से भरी जिंदगी - सर्वोदय। यही नाम रखा था बापू ने डरबन में अपने घर का। फीनिक्स सेटलमेंट में स्थापित यह चार कमरों का मकान आज भी रंगभेद के खिलाफ महात्मा गांधी के संघर्ष की कालजयी गाथा सुना रहा है। बापू ने यहीं रहकर हजारों सत्याग्रही तैयार किए, जिनका बलिदान दक्षिण अफ्रीका की आजादी के इतिहास के पन्नों में दर्ज है। राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल आज जब यहां पहुंची तो यह एक अविस्मरणीय क्षण था। मेजबान थे राष्ट्रपिता और मेहमान थीं राष्ट्रपति।
 पाटिल स्थानीय समय के मुताबिक दिन में 11 बजे यहां पहुंचीं। सबसे पहले उन्होंने परिसर में स्थापित बापू की प्रतिमा पर फूल चढ़ाए। इससे पहले वे अपने जूतों को उतारना नहीं भूलीं। फिर उन्होंने रुख किया सर्वोदय का। उन्होंने पूरे घर को देखा और दीप जलाने के लिए पहुंची। लाइटर ऐन मौके पर धोखा दे गया। इससे पहले कि दूसरा लाइटर मंगाया जाता, राष्ट्रपति ने खुद नीचे रखी माचिस उठाकर जलाई और दीप प्रज्जवलित कर दिया। बाहर निकलने से पहले उन्होंने विजिटर बुक पर हस्ताक्षर भी किए। राष्ट्रपति को देखने व सुनने के लिए यहां फीनिक्स सेटलमेंट ट्रस्ट के ट्रस्टी रगबीर कलीदीन, उनकी पत्नी मधुमती समेत भारतीय मूल के काफी लोग मौजूद थे।
 कहानी सर्वोदय की
 1904 में फीनिक्स सेटलमेंट की स्थापना के साथ ही यह घर महात्मा गांधी ने परिवार सहित रहने के लिए बनाया था। वे यहां पत्नी कस्तूरबा व बेटे मनिलाल के साथ बिजली-पानी के बगैर रहे। 1940 में यह मकान ध्वस्त होने के कगार पर आ गया तो मनिलाल की पत्नी सुशीला व उनकी बेटी सीता गांधी ने 1950 में सर्वोदय का पुनर्निमाण किया। मकान बनाने में महात्मा गांधी के मित्र हरमन कालेनबाय ने उनकी मदद की। 1985 के इंडाना दंगों में सर्वोदय को जला दिया गया। तब डरबन के मशहूर हेरिटेज आर्किटेक्ट रोडने हारबर ने तस्वीरों की मदद से इसे दोबारा बनाया। 27 फरवरी 2000 को दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति थाबो मबेकी ने इसे बतौर स्मारक राष्ट्र को समर्पित कर दिया।
 क्या है फीनिक्स सेटलमेंट
 डरबन से 20 किलोमीटर उत्तर में 1904 में फीनिक्स सेटलमेंट की स्थापना महात्मा गांधी ने की थी। तब यहां चारों तरफ गन्ने के खेत थे।100 एकड़ में बनाए गए इस सेटलमेंट का मकसद रंगभेद के खिलाफ लडऩे वालों के परिवारों को एक स्थान पर बसाना था, ताकि वे बिना किसी चिंता के सामाजिक असमानता के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रख सकें। गांधी जी ने यहां हर परिवार को दो एकड़ जमीन दी। मनिलाल की दूसरी बेटी इला ने इसे कुटुंब नाम भी दिया था। सेटलमेंट में बाजार व डेयरी फार्म भी बनाया गया, ताकि लोगों की दैनिक जरूरतें पूरी हो सकें। यहां रहने वाले सभी लोग नियमित रूप से गांधी जी की प्रार्थना सभाओं में शामिल हुआ करते थे। 1913 में इस परिसर को सुचारू रूप से चलाने के लिए बापू ने फीनिक्स सेटलमेंट ट्रस्ट की स्थापना की। उनके जाने के बाद 1917 में मनिलाल इसके रेजिडेंट ट्रस्टी बनाए गए। गांधी जी ने यहां 1903 में ही इंडियन ओपिनियन नाम से अखबार शुरू किया और इसके लिए प्रिंटिंग प्रेस भी लगाया। शुरुआत में इसे चार भाषाओं तमिल, हिंदी,गुजराती व अंग्रेजी में प्रकाशित किया गया। बाद में तमिल व ंिहंदी संस्करण बंद कर दिए गए। यह अखबार1961 तक जारी रहा, जिसके बाद प्रेस परिसर में क्लीनिक व क्रेच खोल दिया गया। अक्तूबर 2000 में दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जूमा ने ओपिनियन को दोबारा शुरू कराया। गांधी जी ने सेटलमेंट परिसर में एक स्कूल भी स्थापित किया था। 1985 के दंगों में यह स्कूल भी राख हो गया। इसके बाद सेटलमेंट ट्रस्ट ने पूरे परिसर को नए सिरे से तैयार किया। अब यहां स्मारक के रूप में बापू की विरासत सुरक्षित है।
 लुलु से मिलीं पाटिल
 फीनिक्स सेटलमेंट से निकलने के बाद राष्ट्रपति सीधे डा. जॉन लांगलिबलेले दुबे के घर पहुंची जो अब हेरिटेज स्मारक है। 1871 में पैदा हुए जॉन अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस से संस्थापक व पहले अध्यक्ष थे। गांधी जी के करीबी रहे जॉन का निधन 1946 में हुआ था। वे ओहलैंज इंस्टीट्यूट यहां राष्ट्रपति ने जॉन की बहन लुलु से मुलाकात की, जो इस समय 81 साल की हैं। लुलु ने उन्हें जॉन व बापू से जुड़े कुछ संस्मरण भी बताए। इस मौके पर जॉन की पोती नोलवांडले व तीन पड़पोतियां नोमांजी, नोमंटू व नोबंटू भी मौजूद थीं, जिन्हें राष्ट्रपति ने उपहार भी दिए। राष्ट्रपति ने जॉन का पूरा घर देखा और उनकी कब्र पर फूल भी चढ़ाए।
  

उडऩे वाला टाइटेनिक है एयर इंडिया का ये





अभिजित मिश्र. केपटाउन
आप इसे आसमान में उडऩे वाला टाइटेनिक कह सकते हैं। नजदीक जाएं तो किसी विशालकाय इमारत के नीचे खड़े होने का अहसास होता है। एयर इंडिया का बोइंग 747-400  यकीनन अपने भीतर ढेर सारी खूबियां समेटे है, जो इसे देश के प्रथम नागरिक का वाहन (एयर इंडिया-1) होने का गौरव प्रदान करती हैं। डेढ़ दशक से भी ज्यादा समय से भारत के पास मौजूद यह विमान आज भी अंदर व बाहर से ऐसे चमचमाता है, मानो इसे आज-कल में बनाया गया हो। विश्व की कोई भी प्राइवेट एयरलाइंस इस श्रेणी के विमान का इस्तेमाल 400 या उससे भी ज्यादा यात्रियों को मुकाम तक पहुंचाने में करती है, लेकिन राष्ट्रपति व उनके साथ चलने वाले अति विशिष्ट व्यक्तियों के आराम व जरूरतों को ध्यान में रखते हुए एआई-1 को ऐसे डिजाइन किया गया है कि फिलहाल इसमें 155 यात्री ही सफर कर सकते हैं।
यात्रा को अत्यधिक सुरक्षित बनाने के लिए विमान में चार शक्तिशाली इंजन हैं, जो अपनी पूरी शक्ति के साथ इसे आकाश का सीना चीरते हुए 35 हजार फुट की ऊंचाई तक ले जाने में सक्षम हैं। इसकी अधिकतम गति 900 किलोमीटर प्रति घंटा है। इस स्पीड पर भी विमान के भीतर मौजूद यात्रियों को किसी किस्म की असुविधा नहीं होती। तीन मंजिले इस विमान में यात्रियों के लिए कुल 12 दरवाजे हैं, जिसमें 2 पहली मंजिल पर और 10 बीच वाले मुख्य हिस्से में बनाए गए हैं। विमान का सबसे निचला हिस्सा अन्य विमानों की तरह सामान रखने में ही काम आता है। कॉकपिट सबसे ऊपर वाली मंजिल पर है, जिसमें हर समय शानदार फ्लाइंग रिकॉर्ड रखने वाले चार पायलट हर वक्त मौजूद रहते हैं। इसके ठीक पीछे टॉयलेट, एक किचन स्टोर, हैंड बैग्स रखने का स्थान और फिर एग्जीक्यूटिव क्लास 28 सीटें मौजूद हैं। इन सीटों पर अमूमन राष्ट्रपति के साथ चलने वाले डेलीगेट्स व विदेश मंत्रालय के उच्चाधिकारी सफर करते हैं। मूल स्वरूप में जंबो विमान में कुल 12 टॉयलेट होते हैं, पर प्रेसिडेंशियल सुईट बनाने के लिए किए गए बदलाव से एआई-1 में इनकी संख्या घटकर नौ रह गई है।
विमान का बीच वाले हिस्से में सबसे आगे फस्र्ट क्लास है, जिसकी 12 सीटें राष्ट्रपति के साथ चल रहे केंद्रीय मंत्रियों, सांसदों अथवा शीर्ष रक्षा अधिकारियों के लिए आरक्षित रहती हैं। इसके बाद आता है राष्ट्रपति का कंट्रोल रूम। यह रूम संचार तथा सूचना प्रौद्योगिकी से संबंधित सभी आवश्यक अत्याधुनिक उपकरणों से लैस है। राष्ट्रपति यहां बैठकर सेटेलाइट के माध्यम से कोई भी जानकारी हासिल कर सकते हैं। इसके ठीक पीछे है शानदार प्रेसिडेंशियल सुईट, जिसमें एक आरामदायक बेड, ड्रेसिंग टेबल, आदमकद आईना व एक बिग स्क्रीन टेलीविजन लगा है। प्रेसिडेंट का व्यक्तिगत सामान रखने के लिए भी इसमें जगह है। यह बात अलग है कि फ्लाइट टेक ऑफ व लैंड करते समय राष्ट्रपति को भी बेड के बजाय सुरक्षा पेटी बांधकर कुर्सी पर बैठना पड़ता है। सुईट के साथ ही फस्र्ट क्लास श्रेणी की आठ सीटें हैं। अमूमन इनका इस्तेमाल परिजनों या खास मेहमानों द्वारा किया जाता है।
प्रेसिडेंशियल सुईट के ठीक बाद मीडिया के लिए बनाया गया डी-जोन है, जिसमें फस्र्ट क्लास श्रेणी की तीन कतारों में कुल 38 सीटें हैं। इनमें दो सीटों का रुख बाकी सीटों की तरफ है। इनमें से एक सीट का इस्तेमाल प्रेसिडेंट ऑन बोर्ड प्रेसवार्ता के लिए करते हैं। इसके पीछे ई-जोन है, जिसमें तीन कतारों में इकोनॉमी क्लास की 63 सीटें हैं। इन सीटों का इस्तेमाल राष्ट्रपति भवन, सचिवालय व विदेश मंत्रालय के कर्मचारियों व सुरक्षाकर्मियों द्वारा किया जाता है। विमान की सभी सीटें एलसीडी व हेडफोन सुविधा से लैस हैं। इन सीटों के पीछे विमान के आखिरी हिस्से का इस्तेमाल अखबार, मैगजीन, क्रू मेंबर्स की ड्रेसेज तथा विभिन्न यात्राओं के दौरान राष्ट्रपति को भेंट किए गए उपहारों को रखने में किया जाता है।

यहां खाकी बदनाम :- नशा तस्करों से मोटी रकम वसूलने वाले सहायक थानेदार और सिपाही नामजद, दोनों फरार

यहां खाकी बदनाम :- नशा तस्करों से मोटी रकम वसूलने वाले सहायक थानेदार और सिपाही नामजद, दोनों फरार एसटीएफ की कार्रवाई में आरोपियों से...