शुक्रवार, दिसंबर 29, 2017

खेड़ी मल्लाह के हरबंस फूलों की खेती से सालाना कमा रहे 4 लाख

1999में पारंपरिक खेती को छोड़ फूलों की खेती करने वाले गांव खेड़ी मल्लाह (समाना उपमंडल) के हरबंस सिंह की आंखों में सफलता की चमक आसानी से देखी जा सकती है। 10 एकड़ में फूलों की खेती करने वाले हरबंस सिंह कहते हैं कि ग्रैजुएशन के बाद वह दूसरों की तरह सरकारी नौकरी के पीछे नहीं भागे। उन्होंने पारिवारिक पेशे को चुना और आज सालाना चार लाख रुपए की कमाई कर रहे हैं। पिता हाकम सिंह भी बेटे की सफलता से गदगद हैं। कहते हैं शुरू में दो-तीन साल तो काफी मुश्किलें हुईं, लेकिन अब सबकुछ ठीक है। पांच एकड़ जमीन उनकी अपनी है तथा पांच एकड़ उन्होंने ठेके पर ले रखी है। फूलों की अलग-अलग किस्में जैसे मैरी गोल्ड, जाफरी, गुलदाउदी की खेती करते हैं। गेहूं और धान की खेती में एक लाख रुपए का लाभ होता था लेकिन इस फसल से उसको अच्छी आमदनी हो रही है। 
खेतीबाड़ी विभाग से प्रगतिशील खेती के लिए सम्मानित हो चुके हाकम सिंह ने कहा कि उनके अलावा भरपूर सिंह, बलबीर सिंह, महिंदर सिंह, परगट सिंह तथा जसवीर सिंह किसान फूलों की खेती करके अच्छी कमाई कर रहे हैं।उन्होंने कैप्टन सरकार से पटियाला में फूलों की मंडी स्थापित करने की अपील की, ताकि किसानों को फूल बेचने के लिए लुधियाना या दिल्ली जाना पड़े। 
हरबंस ने कहा कि दो साल से फूलों की खेती करने वाले किसानों को जो सब्सिडी सरकार देती थी अब वह बंद हो गई है। यदि सरकार आर्थिक मदद देना फिर शुरू करें तो दूसरे किसान भी फूलों की खेती से जुड़ जाएंगे तथा फूलों की काश्त करने से पंजाब के पानी की बचत के साथ साथ बिजली की बचत भी होगी। इस खेती पर मौसम का प्रभाव भी कम रहता है। 
हरबंस सिंह ने बताया की पेशेवर खेती से कमाई अच्छी नहीं हो रही थी। समय के साथ-साथ नई तकनीकों का ईजाद हो रहा है। उन्होंने सोचा आय में वृद्धि के लिए नई तकनीक से खेती भी करना होगा। इसलिए उन्होंने फूलों की खेती को अपनाया। कहा, खेती में खर्चे बढ़ गए हैं इसलिए आमदनी को बढ़ाना भी जरूरी था। यह तभी संभव है जब पारंपरिक खेती को छोड़कर नई तकनीक अपनाई जाएगी।

गुरुवार, अगस्त 03, 2017

16 साल की उम्र में राजमाता मोहिंदर कौर की यादविंदर सिंह के साथ हुई थी शादी

पाक से आये शरणार्थियों के लिए महल के दरवाजे खोले, खुद नंगे पैर और सिर ढककर लंगर छकाती थीं राजमाता

1967 में पटियाला सीट पर कांग्रेसी सांसद रहीं


14 सितंबर 1922 को मोहिंदर कौर का जन्म लुधियाना में हुआ था। उनके पिता हरचंद सिंह जेजी पटियाला रियासत प्रजा मंडल के मेंबर थे। जेजी सरदार सेवा ठीकरीवाला के सहयोगी व रिश्तेदार भी थे। हरचंद सिंह जेजी को स्टेट से निकाल दिया गया था। जेजी यहां से लाहौर चले गये। मोहिंदर कौर ने लाहौर से पढ़ाई की थी। जेजी की सुलह बाद में महाराजा के परिवार से हो गई। सुलह के बाद अगस्त 1938 में 16 साल की उम्र में राजमाता मोहिंदर कौर की शादी महाराजा यादविंदर सिंह से हुई। राजमाता मोहिंदर कौर ने साल 1939 में पहली बेटी हेमिंदर कौर (नटवर सिंह की धर्मपत्नी) को जन्म दिया। इसके बाद बेटी रूपिंदर कौर का जन्म हुआ। कैप्टन अमरिंदर का जन्म 1942 में और राजा मालविंदर सिंह का जन्म 1944 में हुआ। इतिहासकार कुलबंत ग्रेवाल ने बताया कि राजमाता मोहिंदर कौर इतनी बरकत वाली औरत थी कि इन्होंने सारा महल व परिवार संभालकर एक मुट्‌ठी में करके रखा था। इन्हें अपने शाही शहर पटियाला से बेपनाह मोहब्बत थी और गरीब परवर थी। आज इन्हीं के नक्शेकदम इनकी बहू परनीत कौर भी चल रही हैं। ग्रेवाल बताते हैं कि मोहिंदर कौर ने पंजाब स्टेट में पाकिस्तान से आये शरणार्थियों के लिए शाही महल के अपने दरवाजे खोल दिये। ये खुद लंगर छकाती थीं। इन लोगों की सेवा राजमाता ने नंगे पैर और सिर ढककर की। मेडिकल कैंपों की निगरानी उन्होंने खुद की। वे इन शरणार्थियों के दुख में इस कदर शामिल हुई कि उन्हें दुकानें दिलाई और उनका कारोबार शुरू कराया। बहुत ही धार्मिक वृत्ति की महिला थीं। लोगों का दुख दर्द इनसे देखा न जाता था। शाही परिवार से जुड़ी होने के बावजूद राजमाता मोहिंदर कौर ने लंबे समय तक समाज सेवा की।


सियासी करिअर : इमरजेंसी से कांग्रेस छोड़ जनता पार्टी से जुड़ी

ग्रेवाल ने बताया कि जुलाई 1948 में देश की बाकी रियासतों के साथ पटियाला रियासत का भी मर्जर कर दिया गया तो बदलाव के उस दौर में भी राजमाता ने कई अहम काम किए। मर्जर के बाद पटियाला के साथ कई अन्य रियासतों को मिलाकर पेप्सु (पटियाला एंड ईस्ट पंजाब स्टेट्स यूनियन) बना दी गई थी और राजमाता के पति यानि महाराजा यादविंदर सिंह को इसका राजप्रमुख बना दिया गया था। यादविंदर सिंह इस ओहदे पर साल 1956 तक रहे। साल 1964 में राजमाता मोहिंदर कौर ने पॉलिटिक्स जॉइन की और वह कांग्रेस की ओर से राज्यसभा मेंबर बनीं। 1967 में उन्होंने पटियाला सीट पर कांग्रेस की ओर से लोकसभा चुनाव लड़ा और एमपी बनीं। 1974 में महाराज की मौत के बाद राजमाता ने पॉलिटिक्स छोड़ने का मन बनाया, लेकिन 1977 में इमरजेंसी से नाराज होकर उन्होंने जनता पार्टी ज्वाइन कर ली। साल 1978 से 1984 तक वह जनता पार्टी की ओर से राज्यसभा सदस्य रहीं। बाद में उन्होंने राजनीति छोड़ समाज सेवा से जुड़ गईं। 

मंगलवार, अप्रैल 25, 2017

नॉर्थ इंडिया की सबसे बड़ी ट्रैक्टर मार्केट


चंदन स्वप्निल. 
नॉर्थ इंडिया की सबसे बड़ी ट्रैक्टर मार्केट पटियाला में राजपुरा रोड पर स्थित है। साल 2005 के दौरान नई ट्रैक्टर मार्केट की स्थापना 40.25 एकड़ में की गई थी। यहां इस समय 282 दुकानें हैं। इससे पहले ये मार्केट शहर के अंदर हुआ करती थी। अब इस मार्केट में दो पार्क और दो कार पार्किंग हैं। सड़कें बेहद चौड़ी हैं लेकिन इन पर मार्केट का सामान पसरकर काबिज हो चुका है। इसे कबाड़ी मार्केट के नाम से भी जाना जाता है। यहां पर पुराने माल को असेंबल कर ट्रैक्टर और जनरेटर तैयार करके बेचे जाते हैं।
यहां पर नोटबंदी के बाद कारोबार के असर का जायजा लेने गये, तो इस दौरान पूरी मार्केट में एक भी ग्राहक नहीं मिला। दुकानदार सड़कों पर ही अपने झुंड बनाकर गप्पे मारते दिखे। नोटबंदी के बाद कारोबार में गिरावट जरूर आई है, उसका असर इनके चेहरों पर साफ पढ़ा जा सकता था। जिधर नजर डालें हर ओर केवल कबाड़, गाड़ियों के कल-पुर्जे, जनरेटर और पुराने ट्रैक्टर जो दुकानों से बाहर बरामदे से लेकर सड़कों तक अपना विस्तार कर चुके हैं, यही दिख रहा था।
ट्रैक्टर मार्केट के प्रधान व कैप्टन अमरिंदर के खिलाफ विधानसभा चुनाव लड़ चुके सरूप सिंह सहगल बताते हैं कि उनके बुजुर्ग पाकिस्तान से पटियाला आकर बस गये थे। उस दौरान गाड़ियों का कारोबार शुरू किया था। कोई 30 साल पहले सरूप सिंह ने मार्केट में नये लान्च हुए ट्रैक्टरों के काम में हाथ डाला था। लेकिन मार्केट में पहले जैसा फ्लो नहीं रहा। लोग अब सेकंड हैंड माल को कम ही तरजीह देते हैं। अब रही सही कसर नोटबंदी ने निकाल कर रख दी है। जमीदार जब गेहूं और धान की कटाई करता है, उस वक्त उसके पास खरीद फरोख्त के लिए पैसा होता है। तब लोग इस मार्केट का रुख करते हैं। इस वक्त किसान भी कैश के लिए तरस रहा है। जाहिर है कि फिर खरीदार नहीं मिलने से यहां के दुकानदारों के सामने फाकाशाही जैसी नौबत ही आन पड़ी है।
दुकानदार बीबा सहगल ने बताया कि इससे लिए वे लोग अब आगे माल नहीं खरीद हैं, क्योंकि उनके पास जो पड़ा है उसे ही कोई खरीदार नहीं मिल रहा। वैसे राजस्थान, दिल्ली और पंजाब से लोग यहां पर केवल ट्रैक्टर ही नहीं जनरेटर खरीदने भी आते रहे हैं। नोटबंदी से पहले मार्केट में रोजाना 7 से 10 ट्रैक्टर बिकते थे। अब हाल ये है कि हफ्ते में 5 से 7 ट्रैक्टर ही बिक रहे हैं। इसमें भी जो ग्राहक आ रहा है वो कैश लेकर तो आ ही नहीं रहा। ग्राहक चैक देता है और हम चैक लेने का रिस्क नहीं ले सकते। कल को दिक्कत हुई तो कौन ग्राहक के पीछे चक्कर काटता फिरेगा। अब तो सभी दुकानदारों का हाल ये है कि महीने में गुजारा चलाने लायक इनकम भी नहीं हो रही।
 पिछले 35 दिनों में नोटबंदी का असर इतना पड़ा है कि कुछ दुकानदारों ने अपना स्टाफ भी घटा दिया। इससे बेरोजगारी भी पैर पसार रही है। पास ही एक चाय वाले ने अपना खोका लगा रहा रखा था। पूछने पर उसने बताया कि पहले ग्राहक आते थे, तो उसकी चाय की अच्छी कमाई हो जाती थी। अब पिछले 35 दिन से अब केवल दुकानदार ही चाय पीते हैं। इससे उसकी आय भी कम हो गई है।

गुरुवार, जनवरी 12, 2017

कैप्टन अमरिंदर जिसे पटियालवी महाराजा कहते हैं उसके खानदान के शौक

राज घराने से तालुक रखने वाले पंजाब कांग्रेस सुप्रीमो कैप्टन अमरिंदर सिंह खाना बनाने के शौकीन हैं, उनके बाप दादाओं के शौक भी निराले थे उनके दादा महाराजा भूपिंदर सिंह की ही बात करें तो उन्होंने साल के केलेंडर के मुताबिक 365 शादियां कर डाली थीं, यानि एक रात एक रानी संग बिताते थे।
कैप्टन अमरिंदर के दादा थे ऐसे
-इतिहासकारों के मुताबिक महाराजा भूपिंदर सिंह की 10 महारानियों समेत कुल 365 रानियां थीं।
-महाराजा की रानियों के किस्से तो अब इतिहास में दफन हो चुके हैं,जबकि उनके लिए बनाए गए महल अब ऐतिहासिक धरोहर बन चुके हैं।
-365 रानियों के लिए पटियाला में भव्य महल बनाए गए थे।
-रानियों के स्वास्थ्य की जांच के लिए चिकित्सा विशेषज्ञों की टीम भी इन महलों में ही रहती थी।
-उनकी इच्छा के मुताबिक,उन्हें हर चीज मुहैया करवाई जाती थी।
कुछ यूं 365 रानियों संग रातें बिताते थे महाराजा भूपिंदर सिंह
-दीवान जरमनी दास के मुताबिक, महाराजा भूपिंदर सिंह की दस पत्नियों से 83 बच्चे हुए थे जिनमें 53 ही जी पाए थे।
-महाराजा अपनी 365 रानियों संग कैसे रहते थे इसको लेकर इतिहास में एक किस्सा बहुत मशहूर है।
-कहते हैं कि महाराजा पटियाला के महल में रोजाना 365 लालटेनें जलाई जाती थीं। हर लालटेन पर उनकी 365 रानियों के नाम लिखे होते थे।
-जो लालटेन सुबह पहले बुझती थी महाराजा उस लालटेन पर लिखे रानी के नाम को पढ़ते थे और फिर उसी के साथ रात गुजारते थे।
ये शौक हैं कैप्टन अमरिंदर सिंह के...
-कैप्टन अमरिंदर सिंह खाना बनाने कीे शोकीन हैं, वे नॉनवेज और वेज दोनों किस्म के खानों के शौकीन हैं।
-कैप्टन अमरिंदर के कुर्ते-पायजामे की कीमत कपड़े की वैरायटी के अनुसार 5 से 10 हजार रुपए होती है। कैप्टन को सर्दी में शेरवानी पसंद हैं।
ये करते हैंं पसंद...
घड़ी, डिजिटल केसिओ, शूज़ हाई क्वालिटी लेदर, चश्मा सिंपल स्पैक्ट्स, मोबाइल, सैमसंग, शौक किताबें लिखना, मिलिट्री इतिहास पढऩा, गार्डनिंग, फोटोग्राफी पहनावा गर्मियों में कुर्ता-पायजामा (पायजामा टाइट चूड़ीदार, कुर्ता हाफ बाजू), सर्दियों में शेरवानी-जैकेट भी, खाना वेज-नॉनवेज दोनों। कॉफी ज्यादा पीते हैंं।

शुक्रवार, जुलाई 15, 2016

पटियाला के राजा-रंक

पटियाला में जहाँ महाराजा भूपेन्द्र सिंह का महल अपनी शान पर इतरा रहा है, तो उसी से कुछ क़दम दूर फव्वारा चौक पर उनकी सत्ता को चुनौती देकर प्राण तजने वाले सेवा सिंह ठीकरीवाला की प्रतिमा के तेवर भी कम नहीं है। राजाओं के शहर में एक बग़ावती रंक की यह गर्वीली मौजूदगी जिस विरोधाभास को दिखाती है, वह हम जैसे लोकतांत्रिक समाज में ही संभव है। संयोग से कुछ मिलता-जुलता प्रसंग आज भी दोहराया जा रहा है। महाराजा भूपेन्द्र सिंह के पोते कैप्टन अमरिन्दर सिंह इसी महल में रहते हैं। वे अाने वाले विधानसभा चुनाव में बादलों (प्रकाश सिंह बादल और बेटे सुखबीर सिंह बादल को संयुक्त रूप से यही कहा जाता है)  को धूल चटाकर राज्य के मुखिया बनना चाहते हैं और उनके ही महल के पीछे रहने वाला एक आम आदमी डॉ धर्मवीर गांधी उन्हें चुनौती दे रहा है।आम आदमी पार्टी यानी आप के रूप में। यह पार्टी राज्य में बादलों और कांग्रेस के लिए तगड़ी चुनौती बनकर उभर रही है। एक नौजवान पूछता है-आपके राज्य में आप की क्या स्थिति है?
पटियाला में कुछ और भी ख़ूबसूरत विरोधाभास हैं। एक तरफ़ यह बाबुओं का शहर कहा जाता है तो दूसरी ओर महलों की भव्यता, ऐतिहासिक इमारतों का वैभव और तबियत हरी कर देने वाले बडे बडे बाग़ीचे हैं। जो भी चीज़ है, शानदार है। पंजाब की इस सांस्कृतिक राजधानी में राज्य सरकार के लगभग सोलह मुख्यालय हैं। राष्ट्रीय स्तर के संस्थान अलग हैं। पटियाली सलवारों, चोटियों में बाँधे जाने वाले परांदों, फुलकारी वाले क़ुरतों, पटियाली पगड़ी और जूतियों के अलावा जो चीज़ मशहूर है, वह है पटियाली पैग। जिमखाना क्लब में शाम को इस पैग के लिए शहर भर की क्रीम आबादी जिसमें महिलाएँ भी शामिल हैं, जुटती है।  रजवाड़ों के मनोरंजन और महाराजाओं के सोशेलाइट होने के लिए बनाया गया यह क्लब सौ साल पूरे कर चुका है। एक एकड़ क्षेत्र में फैले क्लब में सदस्यता के तीन-तीन लाख रुपए देकर भी तीन हज़ार सदस्य हैं। यानी बाबुओं के शहर में बडे आदमी बहुत हैं तो रात को आठ बजे बंद हो जाने वाले बाजार के बीच देर रात तक जाम छलकाने वाले भी कम नहीं हैं। सफ़र में सादे भोजन की चाहत और विशाल गुरुद्वारे के दर्शन की मंशा मोतीबाग गुरुद्वारे की तरफ़ खींच लाई। दो बडे गुरुद्वारों में एक मोतीबाग गुरुद्वारा कैप्टन अमरिंदर के मोतीबाग महल के पास ही है। लंगरों में आमतौर पर सादी रोटी और दाल मिलती है। लेकिन इस गुरुद्वारे में शाही भोजन था। दस तरह के अचार, लस्सी और अंत में आइसक्रीम। साथ आए दैनिक पास्कर (पंजाब में भ को प बोलने के कारण कई लोग दैनिक भास्कर को इसी तरह पुकारते हैं। ऐसे ही वहाँ भाईजी पाजी हो गए) के संपादक चंदन स्वप्निल ने बताया कि जिसके घर नया अचार डलता है, पहला घान गुरुघर में ले आता है। शाही प्रसाद के बारे में उनकी कैफियत थी-महाराजाओं का गुरुद्वारा है!

अब लौटकर सेवा सिंह पर आइए। वह अंग्रेज़ी साम्राज्य के विरोध का झंडा बुलंद कर रहा था। पटियाला के महाराजा चूँकि अंगरेजों के समर्थक थे इसलिए वह उनकी सत्ता के मुक़ाबले में खडा था। उसे जेल में डालकर यातनाएँ दी गईं जहाँ वह देश की आज़ादी के लिए क़ुर्बान हो गया। यह विडंबना है कि देश की आज़ादी के लिए लड़ने वाली कांग्रेस में अंग्रेज़ों के तलवे चाटने वाले परिवार के वंशज पार्टी के सिरमौर हैं और आज़ादी के सिपाही का यादगारी जश्न आप पार्टी के लोग मना रहे हैं। वही, महाराजा के महल के पीछे रहने वाला आम आदमी। मैंने एक स्थानीय पत्रकार से इस चुनाव के मुद्दों के बारे में पूछा। यह भी जानना चाहा कि कैप्टन की पाकिस्तानी प्रेमिका अरुषा आलम का मामला कितना रंग लाएगा? वह गाहे-बगाहे चंडीगढ़ डेरा डालती रहती हैं। उनका जवाब सुनकर चौंका-बिल्कुल नहीं। पंजाब के लोग मानते हैं कि महाराजाओं के लिए रंगरेलियाँ कोई गुनाह नहीं। इन सज्जन ने चुटकी ली-दीवान जरमनी दास की किताब महाराजा में महल के क़िस्से आज भी गुदगुदाते हैं और निजी तौर पर ख़राब भी लगते हैं लेकिन महलों में सब स्वीकार्य था। जनता ने भी तब विरोध नहीं किया तो अब क्या करेगी।
शिव कुमार विवेक 

सोमवार, अप्रैल 18, 2016

RG समझदार हो गये, wait for punjab CM candidate

पिछले दिनों राहुल गांधी संपादकों से मिले, उनसे एक सवाल सभी ने पूछा पंजाब में कांग्रेस का सीएम कैंडीडेट कौन होगा? बेहद चालाकी से वे इस सवाल को गोलमोल कर गए। बोले कांग्रेस के नव निर्वाचित विधायक ही अपना सीएम कैंडीडेट चुनेंगे। इस बार वे कैप्टन अमरिंदर सिंह का नाम ऐलान कर गत चुनाव की तरह कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहते। हालांकि इसके पीछे प्रशांत किशोर की एक रणनीति काम कर रही है। सस्पेंस कायम रहे। क्योंकि जनता में भी उत्सुकता रहेगी कि आखिर कौन होगा सीएम कैंडीडेट।                                         वहीं आम आदमी पार्टी भी अपना सीएम चेहरा सामने न लाकर सस्पेंस कायम रखे हुए है। ऐसे में कांग्रेस की तरफ से भी ऐसी ही समझदारी दिखाना कुछ कुछ उस दूरअंदेशी सोच की ओर ही इशारा करता है। बहरहाल राहुल गांधी और प्रशांत किशोर की टीम अभी कैप्टन अमरिंदर सिंह के ग्राउंड कनेक्ट की ओर ज्यादा तरजीह दे रही है। ये थिंक टैंक अभी ऐसा कोई खतरा मोल लेना नहीं चाहता कि अगर कैप्टन को सीएम कैंडीडेट घोषित कर दिया जाता है तो पार्टी में चार गुट ऐसे हैं, जो अभी शिद्दत से चुनाव प्रचार में जुटे हुए हैं, वे पीछे हटकर दूसरी रणनीति पर काम करने लगेंगे। अगर ऐसा होता है तो गुटबाजी का शिकार कांग्रेस को फिर से विपक्ष का ही मुहं देखना पड़ेगा। वहीं प्रशांत किशोर ने कैप्टन के पोस्टर में उनहें पहली बार नीली पग पहने दिखाया है। इसके पीछे भी सोच यही दर्शाती है कि कैप्टन अकाली दल के उस टकसाली वोट बैंक में सेंध लगा सकें। इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी की टीम भी कांग्रेस को सत्ता के गलियारे तक पहुंचाने के लिए कमर कस चुकी है। कैप्टन ब्रांड को चमकाने के लिए पहले कॉफी विद कैप्टन की शुरुआत हुई है। इसके बाद अगले चरण में यह पूछेंगे पंजाब का कैप्टन कैसा होना चाहिए। क्योंकि प्रशांत किशोर को यह पता चला है कि उन्होंने अपने इर्द गिर्द एेसे नेताओं का चक्रजाल बुन रखा है, जो कैप्टन से किसी को मिलने ही नहीं देते। वे कैप्टन के इस औरा को भी मिटाना चाहते हैं।

बुधवार, जनवरी 13, 2016

रफी ने कबड्‌डी में गीदड़ की आवाज निकाल डरा दिया था

रफी साहब की थी तमन्ना, गांव में 3-4 शो करवा दो, गांव शहर बन जाएगा
फीको अपने गांव कोटला सुल्तान सिंह के लिए बहुत कुछ करना चाहता था, किसी ने नहीं दिखाई दिलचस्पी

जन्मदिन, 24 दिसंबर, 1924
मृत्यु, 31 जुलाई, 1980

आज रफी साहब का 91वां जन्मदिवस है। अमृतसर जिले के गांव कोटला सुल्तान सिंह में रफी अपने गांव के लिए बहुत कुछ करना चाहते थे, लेकिन किसी ने कभी कोई दिलचस्पी ही नहीं दिखाई। दूसरी बेड़ियां शादी ने ऐसी डाली कि दोबारा गांव का रूख नहीं कर सके सुर सम्राट मोहम्मद रफी। मोहम्मद रफी को गांव में फीको कहकर पुकारा जाता था। फीको बहुत शरारती था। गांव के एलीमेंट्री स्कूल से उन्होंने प्राइमरी तक की पढ़ाई की। रफी साहब पढ़-लिखने में ठीक-ठीक ही थे। कई बार स्कूल में काम नहीं करने या शरारतें करने के कारण उन्हें डांट भी पड़ती थी। जब पढ़ाई समाप्त हो गई, तो वह तीन-चार महीने ऐसे ही बिना काम के घूमा करते थे। वह बाग में फल खाते और खेत से गन्ने तोड़कर चूसते था। फीको के पिता अली मोहम्मद खाना बनाने में माहिर थे। उनमें इतनी कला था कि एक ही देग (बड़ा बर्तन) में सात रंग के चावल पका देते थे। फीको के गले में मां सरस्वती का वास था। यूं कहें तो आवाज उनकी गुलाम थी तो गलत नहीं होगा। एक बार वे कबड्डी खेल रहे थे तो उन्होंने गीदड़ की आवाज से सभी को डरा दिया था।
याद आए तो पेड़ पर नाम पढ़ लेना
समय का पासा पलटा और फीको मोहम्मद रफी के काम से दुनिया में मशहूर हो गया। वह गांव के लिए बहुत कुछ करना चाहते थे। रफी के बचपन के आड़ी कुंदन सिंह (अब कुंदन सिंह हमारे बीच नहीं रहे) ने बताया था कि 1953 में जब वह अमृतसर के एलेग्जेंड्रा ग्राउंड में शो करने के लिए आए तो वे भी अपने साथियों के साथ उन्हें मिलने के लिए गए। उसकी दिनचर्या इतनी व्यस्त थी कि तीसरे दिन एक सरदारजी ने उनकी मुलाकात करवाई। सरदार जी ने रफी से कहा कि तुहाडे पिंड तों कुज बंदे मिलन आए ने। रफी ने देखा तो झट दोस्त को गले से लगा लिया और बोले कि तुम गांववाले मिलकर मेरे 3-4 शो गांव में ही करवा दो। गांव के पास इतना पैसा हो जाएगा कि हमारा गांव, गांव नहीं शहर बन जाएगा। लेकिन उस समय के सरपंच ने इसमें दिलचस्पी नहीं दिखाई। रिस्पांस नहीं मिलने की सूरत में रफी वहां से लुधियाना अगले शो के लिए चले गए। रफी ने गांव की पंचायत को मुंबई घूमने का न्यौता भी दिया था। फीको और कुंदन सिंह चौथी तक एक साथ पढ़े थे। 1937 में गांव छोड़ते वक्त फीको ने एक आम के पेड़ पर अपना नाम लिखते हुए दोस्त से कहा था कि जब भी मेरी याद आए तो यहां पर आकर मेरा नाम पढ़ लेना। अब वह पेड़ भी काटा जा चुका है।
लाके दंदा च मेखां मौज बंजारा ले गया

रफी साहब ने मुंबई में अपनी दूसरी शादी बिलकिस से रचाई। उसके बाद रफी को गांव की ओर रुख करने की फुर्सत ही न मिली। साल 1972 में रफी का एक शो हुआ था। जिसमें लोगों ने रफी को उनकी पसंद का गीत गाने को कहा तो उन्होंने पंजाबी गीत, लाके दंदा च मेखां मौज बंजारा ले गया, गाकर सभी का दिल लूट लिया था। 

यहां खाकी बदनाम :- नशा तस्करों से मोटी रकम वसूलने वाले सहायक थानेदार और सिपाही नामजद, दोनों फरार

यहां खाकी बदनाम :- नशा तस्करों से मोटी रकम वसूलने वाले सहायक थानेदार और सिपाही नामजद, दोनों फरार एसटीएफ की कार्रवाई में आरोपियों से...