सोमवार, अक्टूबर 17, 2011

english course

Dave's ESL Café (कक्षा 6 से 12 तक)
जिन्हें ग्रामर के पेंच सुलझाने हैं, वे इसे जरूर आजमाएं क्योंकि यहां टेन्स और वर्ब्स की जटिलताओं को दर्जनों उदाहरण देकर समझाया गया है। बोल-चाल की भाषा, उच्चारण, लहजे वगैरह पर दर्जनों चैप्टर हैं जो सिखाते हैं कि लिखने और बोलने की भाषा में क्या फर्क हैं। अंग्रेजी बोलने के इच्छुक लोगों को भी यहां से मदद मिलेगी। अंग्रेजी मुहावरों, कहावतों, सवालों आदि का भी अच्छा-खासा भंडार मिलेगा। साइट पर बाईं ओर मौजूद Stuff for students सेक्शन में जाकर अपने मतलब के चैप्टर्स ढूंढ लें। यहां सवाल भी पूछे जा सकते हैं जिनके जवाब दूसरे यूजर देते हैं। वेबसाइट है : www.eslcafe.com

About.com के ईमेल कोर्स (नर्सरी से आठवीं तक)
इस मशहूर वेबसाइट पर दूसरी भाषा के रूप में अंग्रेजी सिखाने की व्यवस्था है। यह ऐसे स्टूडेंट्स के लिए उपयोगी है जो नियमित रूप से साइट पर जाकर चैप्टर्स नहीं पढ़ सकते। एक बार रजिस्ट्रेशन के बाद आपको रेग्युलर ईमेल मिलने लगते हैं जिनमें अंग्रेजी सीखने के टिप्स होते हैं। रजिस्ट्रेशन के वक्त आपको कई विकल्प दिखाई देते हैं, जिनमें अपनी जरूरत और पसंद के लिहाज से विकल्प चुन सकते हैं। ये Kenneth Beare नामक एक्सपर्ट के बनाए बेसिक लेवल के कोर्स हैं, जो अल्फाबेट के साथ शुरू होते हैं और धीरे-धीरे अडवांस लेवल तक जाते हैं। इन्हें पढ़ाने के लिए हर हफ्ते आपको एक ईमेल भेजी जाती है। वेबसाइट का पता है : www.esl.about.com

Voice of America का क्लासरूम (तीसरी से आठवीं तक)
अंग्रेजी बेहतर करने के लिए यहां विडियो देख सकते हैं। अंग्रेजी शब्दों और वाक्यों के सही उच्चारण भी यहां मिलेंगे। रोजमर्रा की जिंदगी में अंग्रेजी बोलने का अभ्यास करने के लिए ऐक्टिविटी सेक्शन में जाएं। यहां तीन अलग-अलग लेवल (बिगनर, इंटरमीडिएट और अडवांस्ड) में से अपने लिए सही लेवल चुनें और पढ़ाई शुरू करें। इस सेक्शन में अलग-अलग स्थितियों में बोली जाने वाली अंग्रेजी के उदाहरण हैं, मसलन बस स्टैंड पर, कॉफी होम में, रेस्तरां में, डॉक्टर से अपॉइंटमेंट लेना, टेलिफोन पर बातचीत। साइट है : voanews.com/learningenglish/theclassroom/home/

Private English Portal (नर्सरी से आठवीं तक)
स्टीव फोर्ड नाम के इंग्लिश एक्सपर्ट अपनी वेबसाइट पर दर्जनों विडियो के जरिए अंग्रेजी की ट्रेनिंग देते हैं। अगर उच्चारण तेजी से किया जा रहा है और समझ में नहीं आया तो विडियो के साथ-साथ सब-टाइटल भी हैं। प्राइवेट इंग्लिश पोर्टल पर बेसिक से लेकर अडवांस इंग्लिश तक की ट्रेनिंग है। आप चाहें तो बिजनेस इंग्लिश और TOEFL/IELTS की तैयारी के लिए भी इंग्लिश लेसंस ले सकते हैं। स्टीव फोर्ड का अंदाज तो दिलचस्प है ही, अपने विडियो में वे छात्रों का हौसला भी बढ़ाते है। वेबसाइट है : privateenglishportal.com स्टीव के विडियो यूट्यूब पर भी हैं : youtube.com/user/PrivateEnglishPortal

english-grammar-lessons.com (मिडल क्लासेज के लिए)
सही टेन्स, वर्ब आदि का इस्तेमाल न कर पाना समस्या है, तो इस वेबसाइट के फ्री लेसन्स आजमाइए। यहां तीस के करीब ग्रामर लेसन्स हैं जिनके साथ दर्जनों एक्सर्साइज हैं। पियर्सन ब्राउन नाम के अंग्रेजी एक्सपर्ट और उनकी पत्नी कैरोलिन यह वेबसाइट चलाते हैं और उनके लेसन्स ईमेल के जरिए उपलब्ध हैं। ब्राउन दंपति अंग्रेजी की ट्रेनिंग के लिए कुछ और वेबसाइट भी चलाते हैं। ये हैं :
carolinebrownlisteninglessons.com (अंग्रेजी सुनने का अभ्यास)
carolinebrownenglishlessons.com (अंग्रेजी मुहावरे और कहावतें)
hrenglish.com (कामकाज, दफ्तर संबंधी अंग्रेजी)
effective-public-speaking.com (अंग्रेजी बोलने का अभ्यास)
http://business-english.com/ (कारोबारी अंग्रेजी)

Grammar Monster (तीसरी से छठी कक्षा के लिए)
अंग्रेजी ग्रामर के Adverbs, adjectives, conjunctions, pronouns, verbs वगैरह को अच्छी तरह समझने के लिए यह सही ठिकाना है। यहां बेसिक इंग्लिश के कुछ पहलुओं को तीन हेडलाइंस के तहत विस्तार से कवर किया गया है - Punctuation Lessons, Eight Parts of Speech और Miscellaneous. पहले सेक्शन में जहां ब्रैकेट, कॉमा, डैश, सेमी-कोलन आदि का प्रयोग सीखते हैं, वहीं दूसरे सेक्शन में Adjectives, Adverbs, Conjunctions, Interjections, Nouns, Prepositions, Pronouns Verbs के कॉन्सेप्ट्स समझते हैं। तीसरे सेक्शन में Singular, Plural, Abbreviations, Vocative Case, Comparatives आदि की जानकारी दी गई है। वेबसाइट है : grammar-monster.com

इंग्लिश पेज (अडवांस क्लासेज के लिए)
जिन्हें अंग्रेजी की ठीकठाक जानकारी है, मगर जो इसमें अडवांस लेवल की दक्षता चाहते हैं, उन्हें यहां दिए गए ट्यूटोरियल्स पर नजर डालनी चाहिए। यहां इंग्लिश ग्रामर बुक, वीकली लेसन्स, रीडिंग रूम, लिसनिंग लाउंज, लैंग्वेज गेम्स जैसी उपयोगी सेवाएं हैं और अपने इंग्लिश ज्ञान को आजमाने के लिए दर्जनों एक्सर्साइज भी। वीकली लेसन्स में हर हफ्ते एक कॉन्सेप्ट से जुड़ी एक्सरसाइज को लिया जाता है। यहां डिक्शनरी भी हैं और स्टूडेंट्स का फोरम भी चलाया जाता है जहां आप सवालों के जवाब पूछ सकते हैं। पता है : englishpage.com

इंग्लिश ग्रामर लेसन्स (प्राइमरी से अडवांस क्लास के लिए)
यहां ढेरों अंग्रेजी ट्यूटोरियल्स पीडीएफ फाइलों के रूप में डाउनलोड के लिए उपलब्ध हैं। उन्हें डाउनलोड करना मजबूरी नहीं है। आप चाहें तो टेक्स्ट फॉर्मैट में वेबसाइट पर भी इन्हें पढ़ सकते हैं। सैंकड़ों पेज वाली इस वेबसाइट को इंटरनेट पर अंग्रेजी से जुड़ी एजुकेशनल सामग्री के सबसे अच्छे ठिकानों में गिना जा सकता है। ग्रामर के नियमों को और साफ करने के लिए आप Grammar rules review पर नजर डाल सकते हैं। साइट पर विडियो भी हैं, जिन्हें देखकर लगता नहीं कि अंग्रेजी इतनी जटिल भाषा है। वेबसाइट है : englishgrammar.org/lessons

सोमवार, सितंबर 19, 2011

पूंजी नियंत्रण क्या है?


देश में विदेशी पूंजी का प्रवाह कर्ज और इक्विटी के तौर पर होता है।इस कर्ज और इक्विटी को कुछ खास क्षेत्रों में इजाजत होती है। यानि इस संबंध में प्रतिबंधित नियम बनाए जाते हैं। पहले बंद अर्थव्यवस्था वाले  पूंजी पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा देते थे।

लेकिन 1980 के दशक के बाद से कई देशों ने अपनी अर्थव्यवस्था को विदेशी पूंजी के लिए खोलना शुरू किया।पूंजी पर नियंत्रण थोड़ा कम किया गया।बाहर से विदेशी पूंजी को लाने के लिए सुविधा प्रदान की गई।इससे ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम के साथ अर्थव्यवस्थाओं का एकीकरण हो सका।


पूंजी प्रवाह क्या है?
भुगतान संतुलन जो किसी देश का बाहरी बैलेंस शीट होता है के नजरिये से देखें तो विदेशी मुद्रा का प्रवाह दो हिस्सों में बंटा होता है। पहला करंट अकाउंट यानि चालू खाता और दूसरा पूंजी खाता प्रवाह।चालू खाते में प्रवाह वस्तुओं और सेवाओं के लेनदेन से पैदा होता है और यह स्थायी प्रकृति का होता है। विभिन्न तरह के कर्ज और इक्विटी निवेश में पूंजी खाते का प्रवाह जरूरी होता है।हालांकि इसे उल्टा भी किया जा सकता है।यही वजह है कि नीति-निर्माता पूंजी के प्रवाह पर पर नजदीकी निगाहें बनाए रखते हैं।


भारत में पूंजी प्रवाह कितने तरह के हैं?
भारत में कॉरपोरेट और कारोबारी समूह की ओर लिए जाने वाले विदेशी कर्ज, अनिवासी भारतीयों के डिपोजिट और संस्थागत विदेशी निवेशकों की ओर से स्टॉक मार्केट में किए जाने वाले निवेश की वजह से देश में विदेशी मुद्रा आती है। इसके अलावा सरकार की ओर से लिए जाने वाले कर्ज और छोटी अवधि के लोन लेने की वजह से देश में विदेशी मुद्रा यानि पूंजी आती है।


भारत में पूंजी हद तक हटा है?
भारत पूंजी और चालू खाते में होने वाले लेनदेन पर नियंत्रण के जरिये पूंजी नियंत्रण करता है।केंद्रीय बैंक इसके लिए स्थायी करंसी का मूल्य निर्धारित करता है।हालांकि 1991 में जब भारतीय अर्थव्यवस्था के ढांचे में परिवर्तन हुआ तो रुपये को चालू खाते में पहली बार परिवर्तनीय किया गया।1994 में एक बड़ा परिवर्तन किया गया।सरकार ने फॉरेन पोर्टफोलियो इनवेस्टमेंट को मंजूरी दे दी। समय के साथ एफडीआई और विदेशी बाजार से कर्ज लेने के नियम में परिवर्तन किया गया।


दोबारा पूंजी नियंत्रण की बात क्यों उठ रही है?
दरअसल अर्थव्यवस्था में विदेशी पूंजी की मात्रा ज्यादा होने से तरलता बढ़ जाती है। बाजार में तरलता ज्यादा होने से परिसंपत्तियों में बुलबुला बनने लगता है।सस्ता ऋण मिलने की वजह से मुद्रा का इस्तेमाल सटोरिया गतिविधियों में होने लगती है।इससे स्थानीय मुद्रा पर असर पड़ता है।इस समय कई उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं बाहरी पूंजी के बेहतर प्रवाह के असर का सामना कर रही हैं।

इसलिए पूंजी प्रवाह पर नियंत्रण की बात उठ रही है।इसके लिए विदेशी पूंजी पर टैक्स लगाने जैसे उपाय आजमाए जाते हैं।भारत में भी पूंजी प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए टैक्स लगाने की बात उठी है।लेकिन अभी इस पर नीति-निर्माताओं में सहमति नहीं बन पाई है।और न ऐसी स्थिति ही आई है।

क्या होता है परिसंपत्ति बुलबुला?


संपत्ति अपने आप में एक ऐसी चीज है जो किसी भी समय आपके काम आ सकती है। लोग केवल अपने उपयोग के लिए ही संपत्ति की खरीद नहीं करते हैं बल्कि निवेश करने के लिए भी संपत्ति खरीदते हैं। पिछले कुछ समय से सोने की कीमतों में काफी तेजी देखी जा रही है, जिसके चलते जिन लोगों ने पहले ही सोने में निवेश कर दिया था उन्हें काफी लाभ हुआ है।



लेकिन कई बार संपत्ति की कीमत में अचानक से ही बढ़ोतरी होने लगती है तब इस बात की आशंका पैदा हो जाती है कि कहीं यह बढ़ोतरी कृत्रिम (एसेट बबल) तो नहीं है। मतलब कि कहीं यह अचानक से ही गायब तो नहीं हो जाएगी। उदाहरण के लिए सोने की कीमतों को लेकर भी जानकारों के बीच इस बात को लेकर बहस चल रही है कि सोने की कीमतों में आ रहा अप्रत्याशित उछाल वास्तविक है या फिर ये केवल एक एसेट बबल है।
क्या होता है परिसंपत्ति बुलबुला?
एसेट बबल यानि परिसंपत्ति बुलबुले का अर्थ यह है कि जब किसी संपत्ति या वस्तु की कीमत उसकी वास्तविक कीमत से ज्यादा बढऩे लगती है या फिर उसके दाम कीमत के मुकाबले सेंटिमेंट के हिसाब से चलने लगते हैं।



लेकिन फिर अचानक ही उसकी कीमतों में भारी गिरावट आ जाती है जिससे उसके दाम काफी नीचे आ जाते हैं तो इसे एसेट बबल का फूटना कहते हैं। यह पूंजी बाजार ,आर्थिक और व्यावसायिक क्षेत्रों में हो सकता है। परिसंपत्ति बुलुबुला की अवधि तो कम होती है लेकिन यह संबंधित संपत्ति की कीमतों पर अपना असर ज्यादा लंबे समय तक छोड़ता है।




परिसंपत्ति बुलबुला बनने के उदाहरण बताएं?
सबसे बड़ा परिसंपत्ति बुलबुला 20वीं सदी के दूसरे दशक के दौरान अमेरिकी शेयर बाजार में आया था। उस समय अमेरिका में आर्थिक तरक्की और समृद्धि का दौर चल रहा था। लेकिन 1929 में अमेरिकी शेयर बाजार का यह करिश्मा टूटा और वैश्विक मंदी की शुरूआत हो गई। कहा जाता है कि दूसरे विश्व युद्ध के शुरू होने में इस वैश्विक मंदी का भी योगदान रहा था जिसमें लाखों लोग मारे गए थे।



इसी तरह का एक बुलबुला बीसवीं सदी के अंत में भी आया था। इसकी शुरुआत 1990 में हुई थी। इस बबल के दौरान वैश्विक स्तर पर मार्केट में तेजी दर्ज की गई लेकिन 2000 में यह बबल फूटा और दामों में तेजी के साथ कमी दर्ज की गई। इस तरह 2008 के दौरान अमेरिका में हाउसिंग बुलबुला पैदा हुआ और जो आखिरकार सब-प्राइम संकट में तब्दील हो गया है। इसकी वजह से पूरी दुनिया की इकोनॉमी में उथल-पुथल मच गई।




परसंपत्ति बुलबुला को कैसे पहचानेंगे?
परिसंपत्ति बुलबुले की पहचान करने का कोई वैज्ञानिक और प्रामाणिक तरीका नहीं है। इसका पता तब ही चलता है जब यह फूट जाता है। शुरुआती दौर में तो इसका पता करना बहुत ही मुश्किल होता लेकिन बाद में कुछ संकेतों से इसे पहचाना जा सकता है। जब संपत्ति की कीमत लगातार बढऩे लगे तो यह बात समझ लेनी चाहिए कि क्यों बिना रुके संपत्ति की कीमत बढ़ रही है।



संपत्ति की कीमत बढऩा आम बात है लेकिन जब इसमें बिना रुके हद से ज्यादा बढ़ोतरी होने लगे तो यह बात फिर गौर करने लायक हो जाती है कि कहीं यह परिसंपत्ति में बन रहा बुलबुला तो नहीं है जो कभी भी फूट सकता है।

क्या है रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया महंगाई थामने के लिए हमेशा रेपो और रिवर्स रेपो रेट बढ़ाता है। आइए हम बताते हैं कि क्या हैं ये दोनों।

रेपो रेट वह दर है जिस पर रिजर्व बैंक कमर्शियल बैंकों को ऋण देता है। यह ऋण अल्प अवधि के लिए होता है। जब रेपो रेट बढ़ाया जाता है तो ऋण महंगे हो जाते हैं। रिजर्व बैंक इस हथियार का इस्तेमाल बाज़ार में ब्याज दरों को ऊंचा रखने के लिए करता है। जब ब्याज दरें घटानी हो तो रेपो रेट भी घटा दिया जाता है।

इसी तरह रिवर्स रेपो रेट वह दर है जिस पर रिजर्व बैंक को कमर्शियल बैंकों ऋण देता है। यह ऋण भी अल्प अवधि के लिए होता है। इसमें बढ़ोतरी का मतलब यह होता है कि रिजर्व बैंक बैंकों से ऊंची दरों पर धन लेना चाहता है। इससे बैंक रिजर्व बैंक को ज्यादा से ज्यादा धन देना चाहते हैं। ऐसा करके रिजर्व बैंक बाज़ार में तरलता बढ़ने से रोकता है।

सोमवार, अप्रैल 25, 2011

आर्गेनिक खेती में उन्हें दिख रहा भविष्य

एक सेहतमंद विकल्प के तौर पर उभरकर सामने आई आर्गेनिक खेती

५५०० हैक्टेयर पर लगभग ढाई हजार किसान आर्गेनिक खेती कर रहे हैं।

खेमकरण/जालंधर से चंदन स्वप्निल
सीमांत गांवों के किसान भी अब पारंपरिक खेती को छोडक़र आर्गेनिक खेती को तरजीह दे रहे हैं। बिचौलिए और खरीद एजेंसियां किसानों को आर्गेनिक खेती उपजाने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं। इसके जरिए उन्हें मेट्रो सिटी में बाजार उपलब्ध करवाया जा रहा है। बेशक बार्डर के किसान अभी उतने जागरूक नहीं है। समस्त पंजाब में अभी ५५०० हैक्टेयर पर लगभग ढाई हजार किसान ही आर्गेनिक खेती कर रहे हैं। राज्य में कुछ चुनिंदा आउटलेट्स पर यह प्रोडक्ट उपलब्ध हैं। इसके अलावा पंजाब में कुछ बड़ी कंपनियां ऑर्गेनिक थे्रड का भी निर्माण कर रही हैं। बच्चों के इनर वियर्स भी आर्गेनिक कपड़े में बन रहे हैं, इसके अलावा नॉन बीटी का भी इसमें इस्तेमाल होता है। किसानों को बाजार उपलब्ध कराने में आर्गेनिक फार्मिंग कौंसिल आफ पंजाब कुछ हद तक काम कर रही है।
पिछले लंबे अरसे से आर्गेनिक खेती से जुड़े सलाहकार डा. राजिंदर सिंह कहते हैं कि पंजाब में .५ फीसदी की दर से बाजार पनप रहा है, वहीं देश में यह १० फीसदी की रफ्तार से बढ़ रहा है। फिलहाल पंजाब में कुल बाजार २५ करोड़ का है, जिसके अगले साल तक ५० करोड़ तक पहुंचने की संभावना है। इसमें सफलता की गुंजाइश रसायनिक खेती की तुलना में अधिक है, इसमें रातों-रात किसी चमत्कार की उम्मीद नहीं की जा सकती। इसके लिए खेती में विविधता जरूरी है। पहले साल इसमें उत्पादन जरूर कुुछ कम मिलता है, लेकिन तीन साल में यह बराबरी पर आ जाता है। हां, थोड़ा ध्यान जरूर रखना पड़ता है, क्योंकि आर्गेनिक फसल को पेस्टीसाइड भी काफी तंग करते हैं, जिससे कोई भी बीमारी लगने की संभावना बनी रहती है। 
देश में उच्च मध्य वर्ग और उच्च वर्ग ही इसका खरीदार है। आर्गेनिक मार्केट जर्बदस्त उछाल पर है। हालांकि आम किसान को अपने लिए बाजार खोजने में दिक्कत पेश आ रही है। यह कहना है पर्यावरणविद उमेंद्र दत्त का। उमेंद्र आर्गेनिक फूड का पंजाब से एक्सपोर्ट का विरोध करते हुए कहते हैं कि हम यहां जहर खा रहे हैं और आर्गेनिक फूड सारा बाहर भेजा जा रहा है। सरकार को इसके लिए घरेलू बाजार तैयार करना चाहिए। लोग इसे पैसा कमाने की कोशिश कह सकते हैं। बॉयोटैक एक्सपर्ट डा. मुख्तियार सिंह कहते हैं कि नियम यही कहता है कि अगर किसान ने कैमिकल युक्त खेती बीजी है, तो इसके असर से मुक्ति पाने के लिए अगले तीन साल तक खेत खाली रखने चाहिए। पंजाब में केवल ७० फीसदी लोगों के पास ही पांच एकड़ जमीन है। यहां कृषि कभी भी राज्य प्रायोजित नहीं रही है, राज्य में अब भी अतिरिक्त जमीन की बेहद कमी के साथ-साथ तयशुदा बाजार भी उपलब्ध नहीं है। पंजाब पूरे देश का अन्नदाता है, इसे तो केंद्र ने गेहूं जोन घोषित कर रखा है। राज्य सरकार का यह ढकोसला है कि पंजाब में किसान फसली विधिधकरण को अपनाएं, जबकि असल में सरकार की यह मंशा कतई नहीं है।
डा. अमिताभ मोहन जयरथ कहते हैं कि अभी बहुत कम लोग ही ऑर्गेनिक फूड के बारे में जानकारी रखते हैं। इसके लिए कंपनियां विभिन्न कार्यक्रमों के जरिए लोगों को जागरूक करके बता रही हैं कि ये सेहतमंद और सुरक्षित हैं। अगर मरीजों को ऑर्गेनिक फूड दिया जाए, तो यह बीमारी रोकने में कारगर सिद्ध होगा।
पंजाब सरकार ने निर्यात की दृष्टि से आर्गेनिक फारमर कौंसिल का गठन किया था। मकसद इसके जरिए खेती में विविध फसलीकरण को अपनाना था। इसके साथ ही बाजार उपलब्ध कराते हुए निर्यात की सुविधा दिलाना है। इस कौंसिल के साथ ११०० किसान जुड़े हुए हैं। इसके अलावा चंडीगढ़ और नई दिल्ली में एक रिटेल आउटलेट खोला गया है। डा. राजिंदर सिंह कहते हैं कि वे काफी सालों तक इसके साथ जुड़े रहे, लेकिन इस कौंसिल का काम महज कागजों तक ही सीमित रह गया है।
फायदा : आर्गेनिक फूड की डिमांड बढऩे की एक अहम वजह इसका कैंसर, डायबिटीज जैसी खतरनाक बीमारियों से लडऩे में भी सक्षम माना जा रहा है। ग्लोवल वार्मिंग के नजरिए इसमें किसी रसायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं होने से फायदेमंद है। गर्भस्थ शिशु के लिए यह फायदेमंद है। इससे हारमोन असंतुलन का खतरा भी नहीं है। आर्गेनिक फूड सेहतमंद, स्वादिष्ट और ताजा होता है। यह क्लोस्ट्रोल को कंट्रोल कर दिल की बीमारी के रिस्क को घटाता  है। इसमें किसी तरह का कृत्रिम रंग नहीं होता है। सर्वे में जब आर्गेनिक और गैर आर्गेनिक की तुलना की गई, तो आर्गेनिक फूड में विटामिन, आयरन, फासफोरस जैसे आवश्यक तत्वों की मात्रा काफी पाई गई।
यह है आर्गेनिक फूड
उपजाए जाने वाले ऐसे पदार्थ जिन्हें पैदा करने में किसी भी कीटनाशक या रासायनिक पदार्थ का उपयोग न हो। इसके साथ ही ऑर्गेनिक फूड जिनकी प्रक्रिया, उत्पादन से लेकर पैकेजिंग में कहीं भी रसायनिक खाद का इस्तेमाल ना हो, उसे ऑर्गेनिक फूड कहते हैं।
आम खेती यानी जहर वाली खेती : वहीं पारंपरिक खेती में किसान सामान्य उत्पादन में करीब लगभग 300 किस्म के कीटनाशक और रसायनिक खाद का इस्तेमाल करते हैं। इससे यहां मिट्टी के पानी सोखने की क्षमता कम हो जाती है। वहीं सूक्ष्म जीव और जैव विविधता भी खत्म हो जाती है। इसलिए लोग अब ऑर्गेनिक को अपना रहे हैं।
ऑर्गेनिक फूड
सभी सब्जियां, अमरूद, किन्नू, चावल, गेहूं, मूंग दाल, माह दाल, काला चना, गन्ना, टमाटर प्यूरी
ऑयल सीड्स: सरसों और कॉटन, सूरजमूखी
फाइबर : दलिया, रस, वेजीटेबल आचार

दावे सरकारी और हकीकत कोसों दूर


सीमांत गांवों के किसानों को केंद्र व राज्य सरकार की योजनाओं की नहीं है जानकारी
गांव ठरू/माछीके से चंदन स्वप्निल
राज्य और केंद्र सरकार किसानों की खुशहाली के लिए हर सुविधा मुहैया कराने के दावे करती है। लेकिन हकीकत में यहां पर ऐसा कुछ भी नजर नहीं आता है। खेमकरण सेक्टर के सीमावर्ती गांवों के किसानों को किसी भी केंद्रीय योजना की कोई जानकारी नहीं है। उन्हें खेतीबाड़ी के लिए कर्ज लेने में भी कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है। खेती से संबंधित अधिकतर योजनाएं केंद्र द्वारा प्रायोजित हैं, जो इन गांवों में अभी तक पहुंच ही नहीं सकी हैं।
ब्लाक अफसर अपने अधीनस्थ गांवों का चयन करन आधी कीमत पर बीज और जिंक सल्फेट मुहैया करवाता है। ऐसे में यहां पर गड़बड़ी के अवसर ज्यादा रहते हैं। इसमें जो किसान अफसर के संपर्क में रहता है, लाभ केवल उसी को मिलता है। केंद्र प्रायोजित ट्रेनिंग टेस्टिंग डेमोस्ट्रेशन के तहत खेतीबाड़ी विभाग किसानों को नई मशीन चलाने की ट्रेंिनंग इसलिए देता है, ताकि वह इसे बाजार से खरीदने से पहले पूरी जानकारी हासिल कर ले। लेकिन यहां पर कभी भी किसी किसान को विभाग ने ऐसा कोई डेमो पेश नहीं किया। बायो गैस महंगी होने के चलते कोई इसमें हाथ अजमाना नहीं चाहता। यहां पर किसान अब भी पराली को आग लगा देते हैं। वे धान की बिजाई के बाद सीधे गेहूं की रोपाई नहीं करते हैं।
मेंहिदीपुर के किसान सुदर्शन सिंह ने कहा कि वे लोग पहले गन्ने की बिजाई करते थे, लेकिन इस क्षेत्र में कोई भी शुगर मिल नहीं होने के चलते उन्हें गन्ने का सही रेट नहीं मिलता था। इसलिए उन लोगों ने इस क्षेत्र में गन्ने की बिजाई करना ही छोड़ दिया। वहीं हकीकत यह है कि अगर इस इलाके में गन्ने की बिजाई की जाए तो यहां काफी अच्छा उत्पादन हो सकता है। सुदर्शन ने कहा कि सरकारी योजनाएं सिर्फ दिखावे के लिए हैं। उन्हें यहां कोई भी खेतीबाड़ी अधिकारी आकर कभी नहीं बताता कि कैसे बेहतर खेती की जाए और उनके लिए सरकार ने कौन-कौन सी लाभकारी योजनाए शुरूकर रखी हैं। उन्हें अपनी फसल भी औने-पौने दाम में बिचोलियों को बेचनी पड़ती है। किसान औलख सिंहन से मैंने पूछा कि राज्य व केंद्र सरकार की ओर से किसानों को उत्साहित करने के लिए समय-समय पर किसान सिखलाई कैंप लगाए जाते हैं तो उन्होंने बताया कि यह सब केवल हवाबाजी ही है। बार्डर पर ऐसा कोई भी कैंप नही लगाया जाता। पशुधन योजना के बारे में भी उन्हें कोई जानकारी नहीं है। वे लोग तो पशुओं की खरीदारी के लिए कर्ज भी आढ़तिए से लेते हैं। जिसके एवज में उन्हें भारी ब्याज चुकाना पड़ता है। जब मैंने उन्हें अच्छी खेती के लिए जिप्सम पर मिलने वाली सबसिडी के बारे में बताया तो उन्हें इसके बारे में भी कोई जानकारी नहीं थी। इन किसानों का कहना है कि वह अकसर दुकान से कोई भी खाद खरीदकर डाल देते हंै। हैरत की बात तो यह है कि इन्हें सिचाई के लिए खेती औजारों पर मिलने वाली सबसिडी के बारे में भी कोई ज्ञान नहीं है। 
यह है केंद्र का सिस्टम
किसानों के लिए अधिकांश योजना केंद्र की ओर से जारी की जाती हैं। इसके तहत दी जाने वाली सबसिडी में केंद्र और राज्य का 75 और 25 फीसदी हिस्सेदारी होती है। कुछ अन्य योजनाओं में केंद-राज्य की 90 और 10 फीसदी की भागीदारी होती है। इनमें खेती औजारों से संबंधित योजनाओं की सब्सिडी में राज्य का भी हिस्सा है। खाद व बीज केंद्रीय योजना के तहत किसानों को मुहैया कराए जाते हंै।

फैक्ट फाइल
तरनतारन जिले में खेती का रकबा जिले में कुल 2.41 लाख हैक्टेयर भूगोलिक रकबा है। इसमें से 2.17 लाख हैक्टेयर रकबा खेती के तहत आता है। जिले का 99.9 फीसदी रकबा सिचित है। इसी में 60 फीसदी रकबा नहरों और 40 फीसदी रकबा सींचा जाता है। इस जिले में अधिकतर खेती धान, बासमती, गेहंू की होती है, जबकि मक्की, कपास, मसूर, तिल, मूंगी और सब्जियां भी उगाई जाती हैं।  
कोट्स

तरनतारन के डीसी खुशी राम से बात करने पर उनका कहना है कि यह संभव नहीं है कि सीमांत गांवों के किसानों को कोई जानकारी नहीं है। यदि किसानों ने आपसे ऐसा कहा है, तो वे असलियत छुपा रहे हैं। जिला प्रशासन ने तरनतारन में कैंप लगाया था, इसमें जिले के करीब २००० किसानों ने भाग लिया था। इसके अलावा ब्लॉक स्तर पर कैंप लगाकर किसानों को खेती से संबंधित जानकारी दी गई।

महंगाई का ये गजब खेल
किसान का दर्द : मेहनत हम करें और मलाई बिचौलिए खाएं
गांव डालकेक्या आप जानते हैं कि शरद पवार कौन हैं, जवाब नहीं। मैंने बताया कि वह केंद्रीय कृषि मंत्री हैं। इस पर किसान बग्गा ने कहा कि यह बड़ी अच्छी बात है, फिर उनके हाथ में तो सबकुछ है, उन्हें कहिए कि इस महंगाई को जरा कंट्रोल करें। हमारी फसल का हमें उचित मूल्य दें, बिचौलिए हमसे सब्जियां सस्ती खरीदकर ले जाते हैं और उसे ही बाजार में महंगे दाम पर बेचकर भारी मुनाफा कमा रहे हैं। और हम जो सब्जी उगाने वाले हैं, उन्हें तो इसकी लागत भी नहीं मिल पाती। मेहनत हम कर रहे हैं और बिचौलिए मलाई खा रहे हैं। यह दर्द केवल किसी एक बग्गा का नहीं है बल्कि इस क्षेत्र के हर किसान के साथ ऐसा ही धोखा हो रहा है। वह जो सब्जी अपने गांव में उगाता है, बाद में उसी गांव में उक्त सब्जी काफी महंगी बिकती हुई नजर आती है।
मैं जब दोपहर को गांव डालके पहुंचा। वहां मैंने एक खेत में कुछ मजदूरों को मटर बीनते हुए देखा। जब मैंने पूछा कि इसका मालिक कौन है, तभी थोड़ी देर में खेत का मालिक मनजिंदर ङ्क्षसह आ पहुंचा। उसने बताया कि दो एकड़ जमीन पर उसने मटर की बिजाई की थी। अभी मौसम उतना अच्छा नहीं है, इसलिए इस बार बंपर फसल नहीं हो सकी। इन खेतों में मटर की बिजाई पर उसने अब तक २० हजार रुपए खर्च कर डाले हैं। हर मजदूर को वह ४० किलो मटर बीनने पर ५५ रुपए की मजदूरी अदा करता है। इसके बाद मैं उसके साथ मंडी पहुंचा, जहां पर उसने मंडी में १० रुपए प्रति किलो मटर को बेचा। इसके बाद मैंने देखा कि यहां से एक ठेला पर सब्जी बेचने वाला उस मटर को १४ रुपए प्रति किलो के हिसाब से खरीदकर ले गया। उस ठेले वाले ने मंडी से २० किलो मटर खरीदा। इसके बाद वह इसे गांव डालके में बेचने चला गया। जो मटर इसी गांव के किसान ने मंडी में १० रुपए में बेचा था, वही मटर अब ठेले वाला २० रुपए प्रति किलो बेच रहा था। 


खेतीबाड़ी से संबंधित

खेतीबाड़ी से संबंधित स्कीमें मुख्यत केंद्र प्रयाजित है। इनमें से कई स्कीमों में दी जाने वाली सब्सिडी में केंद्र और राज्य का क्रमश 75 व 25 हिस्सा है, जबकि कई स्कीमों में केंद्र और राज्य का क्रमश 90 और 10 फीसदी हिस्सा है। इनमें खासकर खेतीबाड़ी टूल से संबंधित स्कीमों जिनकी सब्सिडी में राज्य का भी हिस्सा है, राज्य सरकार के अपने हिस्सा की सब्सिडी न दिए जाने के कारण इनके ला"ू करने में रुकावट आ जाती है। खाद और बीज पूरी तरह केंद्र सरकार की विभिन्न स्कीमों के तहत ही राज्य के किसानों को दिए जाते है। इसमें राज्य सरकार को कोई हिस्सा नहीं है। यही कारण है कि खाद और बीज से संबंधित इन स्कीमों में ला"ू करने में भी कोई खास रुकावट नहीं आ रही है।

बीज(100 फीसदी केंद्र की स्कीम)
इसमें जालंधर के किसानों के गेहूं, तेल, दालों के बीज सब्सिडी पर मुहैया करवाए जाते हैं।
बीजों के सब्सिडी के मामले में पिछली गेहूं की बिजाई में पांच सौ रुपए प्रति क्विंटल की छूट देकर जिले के किसानों को गेहूं का बीज उपलब्ध करवाया गया था। इसके अलावा जिले के नौ ब्लाकों में से कुछ चुनिंदा गांवों(हर ब्लाक में कुछ गांव) में सीड विलेज स्कीम लागू की गई। इसमें चुने गए हर गांव के किसानों को 21 क्विंटल गेहूं का बीज आधी कीमत पर मुहैया करवाया गया था। इस तरह ही गेहूं के लिए अब तीन सौ टन जिंक सल्फेट केंद्र की तरफ से उपलब्ध करवाया जा रहा है। जिले के नौ ब्लाकों में से हर ब्लाक 20-ग0 टन जिंक सल्फेट दिया जा रहा है। फिर आगे ब्लाक अधिकारी अपने ब्लाक के चुनिंदा गांवों को जिंक सल्फेट देंगे।
गेहूं के अलावा दालों में मटर और छोले के बीजों की किïट्टें भी केंद्र की तरफ से यहां भेजी जाती हैं, जो कि चुनिंदा गांवों के किसानों को मुफ्त दी जाती हैं। इस साल मटर के बीजों की किटें तो पहुंची है, लेकिन छोले की करीब एक हजार किट नहीं पहुंच सकी है।

 ब्लाक अधिकारियों की तरफ से चयन- आधा दाम पर बीज उपलब्ध करवाने और जिंक सल्फेट आदि उपलब्ध करवाने के लिए ब्लाक अधिकारी ही अपने ब्लाक में गांवों का चयन करते हैं। इसके लिए सही लाभपात्रों के चयन का तरीका बहुत पारदर्शिता वाला नहीं है। जिन गांवों के किसान या फिर किसान ब्लाक अधिकारियों के संपंर्क में रहते हैं, उन तक ही यह लाभ सीमित हो जाते हैं।
जालंधर जिला केंद्र के नैशनल फूड सिक्योरिटी मिशन के तहत नहीं आने के कारण इसे पंजाब के दूसरे दस जिलों जितनी सब्सिडी नहीं मिल रही है।

खाद(100 केंद्र की तरफ से सप्लाई होती है)
जालंधर जिले में लगने वाले फसलों की जरुरत मुताबिक खाद की पूरी मात्रा केंद्र की तरफ से ही भेजी जाती है। खेतीबाड़ी विभाग यहां पर लगने वाले फसलों गेहूं, मक्की, आलू, धान आदि की जरुरत मुताबिक अपने डिमांड तैयार करने के राज्य सरकार को भेज देते हैं और फिर राज्य की तरफ से केंद्र से अपने जरुरत की खाद मंगवाई जाती है। खेतीबाड़ी अधिकारियों और किसानों मुताबिक केंद्र की तरफ से भेजी जाने वाली खाद की सप्लाई आम तौर पर उन्हें बिजाई के समय मिल जाती है। खाद का डिस्ट्रीव्यूशन सिस्टम ठीक है।

टूल
किसानों को आधुनिक किस्म के टूल खरीदने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए केंद्र प्रायोजित कई स्कीमें है। इन स्कीमों के तहत टूल खरीदने के लिए दी जाने वाली सब्सिडी में 75 फीसदी हिस्सा केंद्र का और 25 फीसदी हिस्सा राज्य सरकार का है। कई टूल में यह हिस्सा 90 और 10 फीसदी है। राज्य के अपना हिस्से सब्सिडी न देने पर कई बार इन स्कीमों के लागू करने में रुकावट आ जाती है। जालंधर जिले में पिछले साल 265 किसानों इन स्कीमों के तहत आधूनिक औजारों का लाभ उठाया है।

स्कीमें
...  माईक्रो मैनेजमेंट वर्क प्लान (केंद्र प्रायोजित)
इसमें किसानों को नई तकनीक औजार खरीदने के लिए सब्सिडी दी जाती है।
ट्रेनिंग टैस्टिंग डैमोस्ट्रेशन(टीटीडी)(केंद्र प्रायोजित)
इसमें खेतीबाडी विभाग किसानों को नई मशीनरी की डैमोस्ट्रेशन देता है।इसमें खरीदने के लिए कोई सब्सिडी नहीं दी जाती है। विभाग किसानों को नए मशीनरी को चलाने की ट्रेंिनंग इसलिए देता है, ताकि वह इसके बारे पूरी तरह जानकारी लेकर ही इसे मार्कीट में खरीदे। नए मशीनरी को किसानों के प्रयोग के लिए भी मुहैया करवाया जाता है और इसमें किसानों से मशीनरी चलाने के लिए सस्टेंनएवल चार्जेस वसूल किए जाते हैं। जालंधर मे पिछले साल इस स्कीम के तहत लेजर लेवरलर्ज किसानों के सामने रखे गए थे, ताकि पैड्डी के दौरान आ रही लेबर की मुश्किल से इनके जरिए पार पाया जा सके।

बायो गैस स्कीम
- इसमें खेतीबाड़ी विभाग किसानों को सिर्फ तकनीकी सहायता ही देते है। सब्सिडी कोई नहीं दी जाती है। पंजाब एनर्जी डिवैलपमेंट एजैंसी, जो कि पंजाब सरकार का ही एक विभाग है, इसके तहत सब्सिडी दे रहा है। हालांकि इसकी कीमत ज्यादा होने के कारण यह किसानों व गांवों में ज्यादा पापुलर नहीं हो रहा है।

4.  अग्र्रीकल्चर प्रोडक्शन पैट्रन एडजस्टमेंट स्कीम
पिछले करीब पांच सालों में चल रही इस स्कीम में किसानों की खेतीबाड़ी की नई विधियों व नई मशीनरी के इस्तेमाल से खेतीबाड़ी के ढंगों में बदलाव पर जोर दिया जा रहा है। ताकि इससे बढिय़ा पैदावार और लागत में भी कमी आए। इसके तहत जालंधर में 80 एकड़ में गेहूं की बिजाई की गई है। पहले किसान धान के बाद बची उसके अवशेष की सफाई करने के बाद उसे आग लगा देते थे, इससे प्रदूषण काफी फैलता था। अब इस स्कीम के तहत धान की कटाई के बाद उसकी पराली को साफ करने की बजाए उसमें ही गेहूं की बिजाई की गई है। पिछले साल गेहूं की बिजाई के इस प्रयोग से पैदा हुई गेहूं की फसल भी अ'छी है।

आतमा(एग्र्रीकल्चर टैक्नोलॉजी मैनेजमेंट एजैंसी)
इसमें भी किसानों को नई टैक्नोलाजी खरीदने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इस स्कीम के तहत दी जाने वाली सब्सिडी में 90 फीसदी केंद्र और 10 फीसदी राज्य सरकार का होता है। किसानों को नई मशीनरी खरीदने के लिए तैयार  करने के लिए पहले खेतीबाड़ी कैंप लगाए जाते हैं, मशीनरी का प्रदर्शन किया जाता है और इसके अलावा दूसरे राज्यों व राज्य में ही यहां नई मशीनरी का बढिय़ा इस्तेमाल हो रहा है, वहां पर किसानों को लेकर जाया जाता है। साल 200ग से यह स्कीम जालंधर में लागू हुई थी, हालांकि इससे कुछ बढिय़ा परिणाम सामने आए हैं, लेकिन बदलाव की प्रक्रिया काफी धीमी है।

इस स्कीम के तहत किए प्रयासों से जालंधर में हल्दी की खेती की शुरुआत हुई है। फिशरी के लिए नई टैक्नीक लाई गई हैं। कमर्शियल डेयरी को बढ़ावा मिला है।
मार्कीटिंग की स्कीमें
इनके अलावा घी, शहद आदि उत्पादों की मार्कीटिंग के लिए भी केंद्र सरकार की सब्सिडी आ रही हैं, लेकिन इन उत्पादों की मार्कीटिंग अभी तरीके से हो नहीं पा रही है।

यहां पीढ़ी कुदेसन के सहारे बढ़ती है

पता नहीं यहां दुल्हन कब आएगी?
यहां शादी कभी नहीं हो सकती!

सीमांत गांवों में कई बेरोजगार कुंवारे शादी के इंतजार में उम्रज़दा हो गए

किस्सा : तलाश एक अदद दुल्हन की
पंजाब के इन सीमांत गांव में घूमते हुए मुझे अनायास ही जतिंदर बराड़ का लिखा नाटक कुदेसन याद आ गया। कुदेसन को पढऩे के बाद यही लगता है कि जैसे वो दास्तां इन्हीं गांव से ली गई है। यहां के किसान अक्सर बिहार या यूपी अपने पशु बेचने जाते हैं और वहां से किसी की लडक़ी को ले आते हैं, जिसे वे अपनी बहू के रूप में अपना लेते हैं। वहीं कुछ लोग इतंजार में ही अपनी उम्र पार कर जाते हैं।
खेमकरण सेक्टर से चंदन स्वप्निल
सरकार के दावे बड़े लंबे-चौड़े हैं और उनकी पोल यहां पर आकर देखने से खुल जाती है। बार्डर के ये गांव अब भी विकास की राह से कोसों दूर हैं। तरक्की के नाम पर चंद गांवों में ही कुछ पक्की सडक़ें दिख जाती हैं। सीमा से सटे यह गांव देश की बात तो दूर रही अपने राज्य पंजाब से ही कटे नजर आते हैं। दूर-दूर तक यहां नजर पड़ती है, केवल लहलहाती फसल और उनमें गिनी-चुनी कोठीयां या कच्चे मकान दिखते हैं। यहां पर खेतीबाड़ी ही आय का मुख्य साधन है। अधिकतर युवक पढ़ाई के मामले में बारहवीं से आगे बढऩे की हिम्मत हार जाते हैं। इन बेरोजगार युवकों के सामने अपनी खेतबाड़ी या मजदूरी करना ही अंतिम विकल्प बचता है।
दूरदराज तक बसे इन गांवों में बिजली भी जरूर पहुंच गई है। गिने-चुने लोगों के पास मोबाइल फोन भी है। मकान बेशक कच्चे हों, लेकिन छत पर डिश टीवी लगा हुआ जरूर मिलेगा। इससे इतर इनके घर वालों के सामने सबसे बड़ी समस्या अपने युवा हो चुके बेटों के लिए एक अदद बहू की तलाश जैसे सपना ही रह गई है। अधिकतर गांवों में ‘कुदेसन’ ही इनकी पीढ़ी को आगे बढ़ा रही है। 5० वर्षीय कुलबीर कौर का बेटा बारहवीं पास करके पिछले छह साल से घर की खेती में हाथ बंटा रहा है। उनकी एक बड़ी बेटी थी, जिसे उन्होंने शहर में ब्याह दिया है। कुलबीर अपने लंबे-चौड़े गबरू को देखकर यही चिंता सताती रहती है कि पता नहीं उसकी पुत्रवधु आएगी भी या नहीं। कुलबीर उलाहना देते हुए कहती है कि लोग यहां से तो कुड़ीयां ब्याह कर ले जाते हैं। लेकिन सीमांत गांव पर बसे होने के चलते उन्हें कोई अपनी बेटी देना नहीं चाहता। इसकी सबसे बड़ी वजह पड़ोसी मुल्क द्वारा हमले का खौफ और इन गांव में आए दिन तस्करी की खबरें भी इनके लिए परेशानी खड़ी कर देती हैं। जिसके चलते यहां ना तो उतना विकास हो पाया है ना ही कोई काम धंधा ढंग से पनप पाया है। इसलिए लोग अपनी बेटियों को इन गांवों में भेजना ही नहीं चाहते हैं। यह समस्या केवल गांव माछीके की कुलबीर की ही नहीं है बल्कि बार्डर के हर गांव की यही हकीकत है।
जब मैंने कुदेसन से यहां बात करनी चाही तो कोई भी बात करने के लिए तैयार नहीं हुई। लोगों ने दबी जुबान में यह जरूर कबूला कि हां, जब वे लोग बाहर अपनी फसल या पशुधन बेचने जाते हैं, तो वहां से किसी बाहरी लडक़ी को दुल्हन बनाकर ले आते हैं।  इस क्षेत्र में तीस फीसदी युवा शादी के इंतजार में बुढ़ापे की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। उनके लिए शादी जैसे एक हसीन ख्वाब ही रह गई है। लगभग 50 वर्षीय सुरिंदर सिंह ने बताया कि उसकी जवानी शादी के इंतजार में ही बीत गई। अब वह आसपास छोटे बच्चों को खेलते देखकर ही खुश हो जाता है। इस उम्र में आकर उसकी शादी करने की तमन्ना भी खत्म हो गई है। वह कहता है कि रब मेहर करे, जो उनके साथ हुआ वह किसी और के साथ ना बीते।
इन किसानों के घरों में ट्रैक्टर, पीटर रेहड़ा और एक मारूति 800 कार भी दिख जाएगी। जमीन भी इनके पास काफी है। कुछ गिनचुने घरों में एसी भी लगे हुए हैं। लेकिन इक पंजाबण का साथ उनकी दिली ख्वाहिश ही रह गई है। गुरलाल सिंह बारहवी पास है। दूसरे गबरूओं की तरह उसे भी पत्नी का इंतजार है। पढ़ाई करने के बाद उसे कहीं कोई काम नहीं मिला, तो वह मजदूरी की सोच रहा है। उसकी उम्मीद आज भी जवां है कि शायद कहीं से कोई उसके लिए रिश्ता लेकर आएगा।
इन कुंवारों के लिए यही कहा जा सकता है कि
‘रोज ये पंछी आते हैं मेरे दर पे दस्तक देने/
उन बेचारे ख्वाबों का क्या करें, जो तुम्हारी याद दिलाते हैं/
इन आंखों तले हमने भी एक ख्वाहिश छुपा रखी है।’

सामूहिक विवाह में कभी खुलती है किस्मत
हर साल अमृतसर में रोटरी क्लब या अन्य सामाजिक संस्थाएं साल में दो-तीन बार सामूहिक विवाह समारोह का आयोजन करती हैं। इसमें उन लड़कियों की शादी करवाई जाती है, जो काफी निर्धन होती हैं। ऐसे में अधिकतर लडक़े सीमांत गांवों से आते हैं, जो बिना दहेज के इन्हें ब्याहकर ले जाते हैं।
फैक्ट
सीमांत गांवों में कुंवारे ३० फीसदी

यहां खाकी बदनाम :- नशा तस्करों से मोटी रकम वसूलने वाले सहायक थानेदार और सिपाही नामजद, दोनों फरार

यहां खाकी बदनाम :- नशा तस्करों से मोटी रकम वसूलने वाले सहायक थानेदार और सिपाही नामजद, दोनों फरार एसटीएफ की कार्रवाई में आरोपियों से...