रविवार, फ़रवरी 24, 2013

रेप ही होता था मेन डिमांड, आइटम सांग नही


टोटल रिकॉल : सिनेमा 
हीरो रणबीर कपूर का ड्रीम रोल है मोगेंबो। रणबीर कहते हैं कि विलेन की जिंदगी शानदार होती है। वो अमीर होता है, लड़कियों से घिरा होता है और बस अंत में उसे मरना होता है। विलेन की भूमिका निभाना मजेदार होता है और बकौल रणबीर वह एक बुरे आदमी का रोल जरूर करना चाहेंगे। रणबीर की इस बात में दम दिखता है।
बालीवुड में एक वो दौर था, जब विलेन ही पूरी मूवी का खास एक्ट्रेक्शन हुआ करता था। अमृतसर में एक मुलाकात के दौरान विलेन रंजीत ने रेप सीन का जिक्र छेड़ा था कि अब तो हर डायरेक्टर या प्रॉड्यूसर अपनी फिल्म कोहिट कराने के लिए किसी अन्य हिरोइन पर आइटम गीत का तडक़ा जरूर डालता है, कभी या काम हेलन या पद्मा खन्ना, बिंदू जैसी वैंप के जिम्मे हुआ करता था, जो अपनी मादक अदाओं के जलवे से कहर ढाया करती थीं। बेशक आजकल जो भी आइटम गीत आए वे जबरदस्त हिट हुए हैं। ७० दशक के बाद के सिनेमा की बात करें तो फिल्मों में आइटम सांग नहीं, बल्कि विलेन द्वारा रेप के सीन की जर्बदस्त डिमांड हुआ करती थी। अपने जमाने में रंजीत ने फिल्मों में नायिकाओं पर भी खूब कहर ढाया था।
रेप के मामले में प्रेम चोपड़ा का नाम सबसे पहले आता है। उनके नाम फिल्मों २५० रेप के सीन दर्ज हैं। वही दूसरे नंबर रंजीत १५० रेप और डैनी ११० रेप के साथ तीसरे नंबर पर आते हैं। जहां तक रेपिस्टों की टीम की बात हैं तो इसमें चौथे नंबर शक्ति कपूर ८०, अमजद खान ७०, बैड मैन गुलशन ग्रोवर २२, अजीत १२, अमरीश पुरी ९, जीवन ६ का क्रम है। इसमें सबसे मजेदार किस्सा शक्ति कपूर के साथ हुआ। हुआ यूं कि शक्ति कपूर ने लगातार छह फिल्मों मेंं एक ही हिरोइन अनीता राज के साथ रेप का सीन किया। कई बार ऐसा भी हुआ है कि हीरो की तुलना में विलेन अपनी अदाकारी के दम पर दर्शकों की ज्यादा तालियां बटोरने में सक्षम रहे हैं। जॉनी मेरा नाम में पद्मा खन्ना और प्रेमनाथ के उस सीन को कौन भूला होगा। इस फिल्म को हिट कराने में इस जोड़ी का जर्बदस्त हाथ रहा है। शायद यही वजह रही कि इसी दौरान रिलीज हुई राज कपूर की मेरा नाम जोकर इसके आगे बॉक्स आफिस पर पानी भी न मांग सकी।

रविवार, अक्टूबर 21, 2012

'King of Romance' Yash Chopra


September 27, 1932, Born in Lahore to a Punjabi family. Chopra moved to India after the Partition. Chopra's basic plan was to pursue a career in Engineering. His passion for film making led him to travel to Mumbai where he initially worked as an assistant director to I.S. Johar, and then for his director-producer brother B RChopra. The Chopra brothers made several more movies together during the late 50s and 60s.
 He began his career as an assistant director to his elder brother B R Chopra and directed his own first film ' 'Dhool Ka Phool'  in 1959. Chopra 's first commercial hit was a multi-starrer family drama Waqt.         In 1973, Chopra founded his own production company, Yash Raj Films, and launched it with "Daag: A Poem of Love" starr rajesh & sharmila.  
 '80s several films he directed and produced failed at box office. Chopra rose like phoenix with the grand hit movie Chandni thus beginning his journey of making romantic Hindi movies.  After that he directed  classic Lamhe  in 1991.
And this was the time Yash Chopra changed the face of ROMANCe in Bollywood.
Chopra who was one of the pillars in Bollywood, directed some of Indian cinema's most successful and iconic films "Deewar" which established megastar Amitabh Bachchan as the "angry youngman". The hit duo of Chopra and Bachchan worked together again in romantic drama "Kabhi Kabhie, Trishul, Silsila". Chopra is today known mostly for the romantic films like  'Silsila', Chandni, DDLJ, DTPH, Veer-Zaara, JTHJ. His association with SRK began with the 1993 romantic psyo thriller Darr, which turned out to be a superhit. Even though he lauched yash raj music under his banner.
         
          

शुक्रवार, अगस्त 24, 2012

सरकार ने कह कर ली


आज मुझे व्यंगयकार व हास्य कवि स्वर्गीय हरिओम जी की एक कविता याद आ गई, जो मैंने कोलकाता नेताजी इंडोर स्टेडियम में एक हास्य कवि सम्मेलन में सुनी थी, जै, जै सोनिया माता, इटली की तू देवी, जै जै सोनिया माता...। वजह साफ है कि महारानी का राज अभी खत्म नहीं हुआ है, विक्टोरिया चली गई तो क्या हुआ, सोनिया माता और उनका बाबा ओह! सॉरी, प्रिंस का राज तो है। तभी तो हम अब भी गुलाम ही हैं, पिछले दिनों सबने देश की आजादी की ६६ वी बरसी मनाई, चौंकिए मत, मैं बरसी ही कहूंगा। क्योंकि कौन कहता है कि हम आजाद हुए थे, कम से कम यूपीए सरकार तो हमे पग-पग पर यही समझाइश दे रही है। जिस देश में विचारों की आजादी न हो, तो भला वह देश कैसे आजाद हो सकता है। केंद्र सरकार ने सद्भावना कायम रखने के ड्रामे के नाम पर आपकी, हमारी सबकी वैचारिक स्वाधीनता की आजादी तो कह कर छीन ली है। तभी तो सोशल साइट्स ट्विटर के छह पीएमओ के नाम से चलने वाले एकाउंट बंद करवा दिए गए। दरअसल यह सरकार अब अपनी बुराई और छिछली कतई बर्दाशत नहीं कर पा रही है। जो ६ एकाउंट बंद करवाए गए, अगर उनका गत झांके तो आपको हैरानी होगी कि इन्होंने कभी भी ऐसी कोई बात नहीं की कि जिससे देश में सांप्रदायिकता व दंगे भडक़े हों। दरअसल यह तो अक्सर हमारे निरीह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी सरकार का मजाक ही तो उड़ाते थे। यह वही मनमोहन है, जब २६ जनवरी की परेड में सारी दुनिया आकाश में हमारे वायुसेना के कर्तव्य देख रही थी और यह बेचारे निरीह नजरे झुकाए बेअसर बैठे थे। शायद इसलिए देश में कुछ भी हो जाए इन पर कोई असर नहीं होता। और यह भी तब जबकि उनके मीडिया मैनेजर पंकज पचौरी है, जिन्हें आप मुझसे बेहतर जानते हैं।
ट्विटर एकाउंट बंद करना महज एक ड्रामा है, दरअसल सरकार अपनी इतनी बेइज्जती करवा चुकी है कि वह अब इस तरह की टुच्ची हरकतों पर उतर आई है, हो सकता है कि कल अखबारों में कार्टून छपने पर भी बैन लग जाए। यानी आपकी सोच पर दहशत और खौफ का पहरा। क्या यह सरकार इमरजेंसी लागू करने की तैयारी कर रही है या उस और कदम बढ़ा चुकी है। इतना तो तय है कि आज जब सारी दुनिया हमारी अर्थव्यवस्था पर नजरें गड़ाएं बैठी है कि कब यह सरकार कुछ साहसी कदम या फैसले लेगी जिससे विश्व की अर्थव्यवस्था को कुछ मदद मिल सके। लेकिन सवाल ही पैदा नहीं होता हम तो हम हैं, भला अगला चुनाव भी तो जीतना चाहते हैं, लेकिन तब तक पता नहीं यह देश का कितना बेड़ा गर्ग कर चुके होंगे। अभी तो बस २० एसएमएस तक पाबंदी है, वो २१वां नाजायज एसएमएस कब और किसका होगा?


न छेड़ बांसुरी का राग/ इससे राग नहीं
बैराग निकेलगा ना।
यह हाथ न पकडऩा/ यह हाथ नहीं
डूबता सहर है
असम, १९८३ जनवरी से अप्रैल मेें भी क्या सोशल साइट्स ने सांप्रदायिक सौहाद्र्र को नुकसान पहुंचाया था? जब असम में ३००० बंगाली मुसलमान मार डाले गए थे, जबकि सरकार यह आंकड़ा केवल १८०० ही बताती थी। उस वक्त इतनी दहशत थी कि असम से हिंदू बंगाली भी पलायन कर गए थे। दरअसल असम के दंगों की समस्या वहां की अवैध घुसपैठ रही है, जिसे कांगे्रस अपना वोट बैंक का हथियार बनाकर सरकार बनाने में कामयाब रही है और रहती है। दरअसल असम के हालिया दंगों के पीछे भी केंद्र की साजिश कही जा सकती है। क्या आपने आज तक कभी सुना था कि किसी राज्य सरकार ने विशेष ट्रेन चलाई हो। क्योंकि कर्नाटक में बीजेपी की सरकार है और इधर कांगे्रस की। अब आप समझ ही गए न कि ये ड्रामा हुआ ही क्यों?  

अरे, भारतवासियो अब भी चेत जाओ, बता दो कि हम न डरे थे कभी न डरेंगे। वैचारिक स्वतंत्रता हमसे न कोई छीन पाया है और न कोई छीन पाएगा। मैं तो लिखूंगा और खूब लिखूगा, देखें वो अहले जमाना क्या कर गुजरता है या फिर मेरा अपना वजूद..।

सडक़ों पर चलते चलते थक गए हैं पेड़/ बेरहमी के साथ हो रही हैं छांव की मौत/ कौन देखता है/है किसमें हिम्मत रोकने की
आलने में बिलखते यतीम वोट/यहां तो महज मसंदों का बास है
यह शहर नहीं एक तालिबान का नगर है/मत सुन भटके आदमी

रविवार, जुलाई 01, 2012

संताप




जानिए इतना के कुछ भी न जान पाएं
और समझाइश इतनी के कुछ भी न समझ पाएं
आओ कहें इतना के हम-तुम कुछ कह न पाएं
हो तमन्ना मगर न जाहिर कर पाएं

मचा है शोर इतना के शोर भी शांत कर जाएं
है आतंक मगर अब भी संताप दूर  न कर पाएं
क्यों ये कारवां फिर जुटा रहा है के कुछ कर जाएं
क्योंकि अब भी कई घर नहीं भूल पाए 84 का पंजाब

बुधवार, मई 09, 2012

बैरिस्टर से महात्मा बना दिया इस अफ्रीकी जेल ने


अभिजित मिश्रत्न सेल नंबर-4, कांस्टीट्यूशन हिल्स (जोहांसबर्ग)।

नीचे उतरती सीढिय़ों की छत पर लिखा है - जब तक आप जेल में न रहे हों, आप उस देश की सही तस्वीर नहीं जान सकते।
दो कदम नीचे उतरता हूं। संदेश का अगला हिस्सा - किसी देश की पहचान इससे नहीं होती कि वह अपने विशिष्ट नागरिकों के साथ कैसा सलूक करता है, बल्कि देखना यह चाहिए कि वह निचले पायदान पर खड़े व्यक्तियों से कैसा बर्ताव करता है।
सीढिय़ां खत्म होने को हैं। संदेश की अंतिम लाइन - और दक्षिण अफ्रीका ने अपने अफ्रीकी नागरिकों के साथ ऐसा सलूक किया, जैसे वे जानवर हों। संदेश के अंत में 
लेखक का नाम दर्ज है- नेल्सन मंडेला।
जोहांसबर्ग की ब्रामफोटेंन पहाड़ी पर बने ओल्र्ड फोर्ट प्रिजन कांघ्लेक्स की जिन सीढिय़ों का जिक्र हो रहा है वो सीधे सेल नंबर - 4 को जाती हैं, जहां एक बैरिस्टर के महात्मा बनने की कहानी खाली बैरकों में आज भी गूंज रही है। आज यह किला कांस्टीट्यूशनल हिल्स कोर्ट कांघ्लेक्स में तब्दील हो चुका है, लेकिन इसके काफी बड़े हिस्से को बतौर विरासत पुराने स्वरूप में कायम रखा गया है। यह हिस्सा सेल नंबर 4-5, वीमेंस सेल व अवेटिंग ट्रायल बिल्ंिडग को समेटे हुए है। धडक़ते दिल से चार नंबर सेल में प्रवेश करता हूं, जिसके दरवाजे पर अब किसी ने लिख दिया है - लाइफ इन ए सेल। कमरे की फर्श पर रोल किए हुए कुछ बिस्तर ऐसे पड़े हैं, मानो कैदी लेटे हुए हैं। एक कोने में एक फुट की आड़ में शौचालय है। इस सेल के ठीक सामने वाली कोठरी में अब पुराने कैदियों की बड़ी-बड़ी तस्वीरें लगा दी गई हैं। एक सवाल के साथ - हू इज द क्रिमिनल। एक तस्वीर हमारे बापू की भी है। कसूर भी दर्ज है - अश्वेत लोगों के साथ भेदभाव करने वाले कानून के खिलाफ अहिंसात्मक आंदोलन का नेतृत्व! बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी को यहां 1908 से 1913 के बीच किस्तों में सात महीने दस दिन की सजा काटनी पड़ी।
भेदभाव की इंतहा घ् 1902 से 1904 के दौरान खास तौर पर अश्वेत कैदियों के लिए बनाए गए सेल नंबर 4-5 में बापू ने जो देखा-जो झेला, उसका अंदाजा इतिहास में दर्ज हो चुके कैदियों के बयानों से लगाया जा सकता है। 907 कैदियों की क्षमता वाले सेल नंबर 4-5 में 2200 से 'यादा कैदी ठूंस दिए गए थे। जिन कोठरियों में अधिकतम 30 कैदियों को रखा जाना था, वहां 60 कैदियों को दिन के 23 घंटे बिताने पड़ते थे। गोरे कैदियों को एक दीवान, एक मैट्रेस, एक पिलो, तीन कंबल, चार चादरें, दो पिलो कवर व एक बिछौना दिया जाता था। वहीं अश्वेतों को सिर्फ दो चटाई व तीन फटे-पुराने कंबलों से संतोष करना पड़ता था। इतना ही नहीं, खाने में भी जमीन आसमान का अंतर रखा जाता था। अश्वेत कैदियों को मांस के नाम पर सड़ी-गली उबली मछलियां दी जाती थीं, जिसकी बदबू उल्टियां करने पर मजबूर कर देती थी। खाना इतनी देर में मिलता था कि आंतें कटने लगती थीं और फिर वह बदबूदार खाना भी नियामत जैसा लगता था। ये खाना भी टीन की निहायत गंदी जूठन लगी घ्लेटों में परोसा जाता था। इंसानों के साथ जानवरों जैसे सलूक के ऐसे कई किस्से दीवारों पर चस्पा हैं।
दिन-रात जुल्म घ् रंगभेद चरम पर था। पुलिस दिन व रात में कई बार अश्वेत कैदियों के पास पहुंचती थी। उन्हें पूछताछ के बहाने पीटा जाता था। फिंगर प्रिंट लिए जाते थे। गर्मी हो या जाड़ा, नंगा करके तलाशी ली जाती थी। यहां तक कि जेल वार्डन उन्हें घुटनों के बल झुका कर सुनिश्चित करते थे कि कहीं उन्होंने गुदा में कुछ छिपा तो नहीं रखा है। कुछ युवा कैदियों के यौन उत्पीडऩ के किस्से भी यहां दर्ज हैंं। विरोध करने वाले कैदियों को काल कोठरी (डीप डार्क होल) में महीने भर के लिए फेंक दिया जाता था। खाने के नाम पर सिर्फ उबले चावल का पानी। इन सेल में रोशनी व हवा का कोई इंतजाम नहीं होता था। जेल अफसर कालकोठरी का इस्तेमाल कैदी का मनोबल तोडक़र उन्हें नए कानून के सामने झुकने पर मजबूर करने के लिए करते थे। लेकिन, सलाम उस ज'बे को। ये काल कोठरियां कैदियों के जुनून को परवान चढ़ाने लगीं। कैदी यहां विरोध के नारे और गीत गाने लगे। चलते-चलते जेल की दीवारों को सहलाता हूं। अजीब का रोमांच होता है। आखिर कुछ तो रहा होगा इन पत्थरों में जिन्होंने एक दुबले-पतले साधारण से इंसान में फौलाद भर दिया। बाहर आने के बाद भी जैसे कानों में बापू के शब्द गूंज रहे हैं - ...मैं इसका जवाब जरूर दूंगा। मैं अपना संदेश अपने लोगों तक हर हाल में पहुंचाउंगा। उत्पीडऩ का यह दंश मेरे बहुंत भीतर तक उतर गया है। यह बाहर नहीं निकलेगा। अब जो रास्ता मुझे दिखाई दे रहा है, मुझे उस रास्ते से कोई डिगा नहीं सकता...। जेल के बाहर हवा नम है, लेकिन आजादी के इन परवानों की स्मृति में जल रही आग की तपिश बरकरार।

गोरों की काली कहानी है रॉबेन आइलैंड


नेल्सन मंडेला की जेल का दौरा किया प्रतिभा पाटिल ने
अभिजित मिश्र रॉबेन आइलैंड (केपटाउन)।
... रॉबेन टापू आज उन सभी लोगों के लिए श्रद्धा का केंद्र है जो स्वतंत्रता व सम्मान के साथ जीने के अधिकार का समर्थन करते हैं। ये टापू रंगभेद के खिलाफ दक्षिण अफ्रीका के संघर्ष की कहानी को समेटे हुए है। ये विपरीत परिस्थितियों व निर्मम ताकतों पर मानवता की जीत का प्रतीक है। ये जगह हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता संग्राम के सिपाहियों को कैसे हालात का सामना करना पड़ा। दक्षिण अफ्रीका की आजादी के नायक नेल्सन मंडेला को यहां 17 साल कैद में रखा गय। इस टापू व मंडेला के सेल नंबर 5 का दौरा भीतर तक झकझोर रहा है। शक्ति, साहस व बलिदान की यह गाथा सदियों तक युवाओं को इंसाफ व आजादी की रक्षा करने के लिए प्रेरणा देती रहेगी।
राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने शनिवार को केपटाउन से करीब 11 किलोमीटर दूर रॉबेन आइलैंड की मैक्सिमम सिक्योरिटी जेल का दौरा करने के बाद विजिटर बुक पर अपने ये शब्द दर्ज कर दिए। वह यहां रंगभेद के खिलाफ अथक संघर्ष करने वाले नेल्सन मंडेला और उनके जैसे तमाम लोगों के दर्द से रूबरू होने आई थीं। दक्षिण अफ्रीका के पहले लोकतांत्रिक राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला  को यहां 17 साल तक 6 वर्ग मीटर की कोठरी में कैद रखा गया था। 11 फरवरी 1990 को रिहा होने से पहले मंडेला ने कुल 27 साल सलाकों के पीछे गुजारे। ब्रिटिश सरकार की रंगभेदी नीतियों व कानून के खिलाफ आवाज उठाने वाले अश्वेत लोगों के यातना केंद्र के रूप में बदनाम रहे रॉबेन टापू में पैन अफ्रीकन कांग्रेस के संस्थापक राबर्ट मैंगलिसो सोबुकवे ने भी लंबा वक्त गुजारा है।
बहुत झेला नेल्सन ने
इसी जेल में सात साल कैद रहे 46 वर्षीय स्पार्क मिलवाना अब इस हैरिटेज जेल के गाइड हैं। वे बताते हैं कि मंडेला को यहां जबरदस्त यातना झेलनी पड़ी। उन्हें छोटी से काल कोठरी में नंगे पैर 23 घंटे बिताने पड़ते थे। सिर्फ तीन कंबल और एक बाल्टी, यही सामान था उनकी कोठरी में। सघ्ताह में एक दिन उन्हें बाहर निकाला जाता था और चूना पत्थर की खदान में काम पर लगा दिया जाता। उनके हाथों से खून निकलने लगता और छाले पड़ जाते। डॉक्टर सघ्ताह में एक ही दिन आता था।
जबान पर भी लगाम
स्पार्क बताते हैं कि यहां जेल में बंद कैदी किसी से बात नहीं कर सकते थे। कोठरी के भीतर सेंसर लगा हुआ था, जरा भी आवाज होने पर कोठरी के बाहर लगा लाल रंग का बल्ब सायरन के साथ बजने लगता था। जेल अधिकारी आते और शुरू हो जाता यातना का नया दौर। कैदियों को उनके मूलस्थान, रंग व अपराध के आधार पर छांटा जाता था। सबसे खराब जिंदगी अश्वेतों की थी, जिन्हें कभी पूरे बाजू की शर्ट-पैंट व जूते-मोजे नहीं दिए जाते थे। एक बार रेडक्रास की टीम मंडेला से मिलने पहुंची तो उन्हें जबरन फुल पैंट व शर्ट पहना दी गई। अफ्रीका में 11 जबानें बोली जाती हैं, लेकिन यहां कैदियों को सिर्फ अंग्रेजी या अफ्रीकन में बोलने की इजाजत मिलती थी, ताकि जेल स्टाफ समझ सके। इसका उल्लंघन करने पर पीटना या भूखा रखना आम था। रॉबेन टापू को 1959 में जेल में तब्दील किया गया और 1961 से 1991 के बीच यहां 3000 से ज्यादा राजनीतिक कैदी बंद रहे। इस टापू का इस्तेमाल कुष्ठ रोगियों को भी रखने में किया गया, जिसके निशान आज भी यहां अलग कब्रिस्तान व चर्च के रूप में मौजूद हैं। इन रोगियों व उनके बच्चों के साथ भी अमानवीय सलूक किया जाता था।
जेल से बाहर निकली आत्मकथा
वर्ष 1983 से 2000 तक इसी जेल में बंद रहे स्पार्क याद करते हैं कि कैसे मंडेला ने जेल में रह कर अपनी आत्मकथा लिखी और उसे एक पेड़ के नीचे दबा दिया, लेकिन जेल अधिकारियों ने इसे खोद निकाला। बहरहाल, मंडेला इसकी एक प्रति मैक महाराज (सत्येंद्रनाथ रघुननन) तक पहुंचाने में सफल रहे, जो भारतीय मूल के व्यवसायी होने के साथ तत्कालीन परिवहन मंत्री भी थे। अधिकारियों ने इसे कोड ऑफ कंडक्ट का उल्लंघन माना और मंडेला को सजा भी मिली, लेकिन रेत मुट्ठी से निकल चुकी थी। मैक महाराज ने मंडेला की यह कहानी प्रकाशित करा दी, जो लांग वॉक टू फ्रीडम के नाम से बेस्टसेलर साबित हुई। जेल से रिहाई के बाद जब मंडेला राष्ट्रपति बने तो उन्होंने मैक महाराज के इस अहसान का बदला उन्हें दोबारा परिवहन मंत्री बनाकर चुकाया। उनके पदभार ग्रहण करने पर मंडेला ने कहा - ये मेरी तरफ से आपको सूचना परिवहन करने का तोहफा है। मैक इन दिनों राष्ट्रपति जैकब जूमा के आधिकारिक प्रवक्ता हैं।

राष्ट्रपिता के घर पहुंचीं राष्ट्रपति



महात्मा गांधी के संघर्ष की कालजयी गाथा है सर्वोदय
 अभिजित मिश्र डरबन (दक्षिण अफ्रीका)।
 सबके लिए खुशहाली और सम्मान से भरी जिंदगी - सर्वोदय। यही नाम रखा था बापू ने डरबन में अपने घर का। फीनिक्स सेटलमेंट में स्थापित यह चार कमरों का मकान आज भी रंगभेद के खिलाफ महात्मा गांधी के संघर्ष की कालजयी गाथा सुना रहा है। बापू ने यहीं रहकर हजारों सत्याग्रही तैयार किए, जिनका बलिदान दक्षिण अफ्रीका की आजादी के इतिहास के पन्नों में दर्ज है। राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल आज जब यहां पहुंची तो यह एक अविस्मरणीय क्षण था। मेजबान थे राष्ट्रपिता और मेहमान थीं राष्ट्रपति।
 पाटिल स्थानीय समय के मुताबिक दिन में 11 बजे यहां पहुंचीं। सबसे पहले उन्होंने परिसर में स्थापित बापू की प्रतिमा पर फूल चढ़ाए। इससे पहले वे अपने जूतों को उतारना नहीं भूलीं। फिर उन्होंने रुख किया सर्वोदय का। उन्होंने पूरे घर को देखा और दीप जलाने के लिए पहुंची। लाइटर ऐन मौके पर धोखा दे गया। इससे पहले कि दूसरा लाइटर मंगाया जाता, राष्ट्रपति ने खुद नीचे रखी माचिस उठाकर जलाई और दीप प्रज्जवलित कर दिया। बाहर निकलने से पहले उन्होंने विजिटर बुक पर हस्ताक्षर भी किए। राष्ट्रपति को देखने व सुनने के लिए यहां फीनिक्स सेटलमेंट ट्रस्ट के ट्रस्टी रगबीर कलीदीन, उनकी पत्नी मधुमती समेत भारतीय मूल के काफी लोग मौजूद थे।
 कहानी सर्वोदय की
 1904 में फीनिक्स सेटलमेंट की स्थापना के साथ ही यह घर महात्मा गांधी ने परिवार सहित रहने के लिए बनाया था। वे यहां पत्नी कस्तूरबा व बेटे मनिलाल के साथ बिजली-पानी के बगैर रहे। 1940 में यह मकान ध्वस्त होने के कगार पर आ गया तो मनिलाल की पत्नी सुशीला व उनकी बेटी सीता गांधी ने 1950 में सर्वोदय का पुनर्निमाण किया। मकान बनाने में महात्मा गांधी के मित्र हरमन कालेनबाय ने उनकी मदद की। 1985 के इंडाना दंगों में सर्वोदय को जला दिया गया। तब डरबन के मशहूर हेरिटेज आर्किटेक्ट रोडने हारबर ने तस्वीरों की मदद से इसे दोबारा बनाया। 27 फरवरी 2000 को दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति थाबो मबेकी ने इसे बतौर स्मारक राष्ट्र को समर्पित कर दिया।
 क्या है फीनिक्स सेटलमेंट
 डरबन से 20 किलोमीटर उत्तर में 1904 में फीनिक्स सेटलमेंट की स्थापना महात्मा गांधी ने की थी। तब यहां चारों तरफ गन्ने के खेत थे।100 एकड़ में बनाए गए इस सेटलमेंट का मकसद रंगभेद के खिलाफ लडऩे वालों के परिवारों को एक स्थान पर बसाना था, ताकि वे बिना किसी चिंता के सामाजिक असमानता के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रख सकें। गांधी जी ने यहां हर परिवार को दो एकड़ जमीन दी। मनिलाल की दूसरी बेटी इला ने इसे कुटुंब नाम भी दिया था। सेटलमेंट में बाजार व डेयरी फार्म भी बनाया गया, ताकि लोगों की दैनिक जरूरतें पूरी हो सकें। यहां रहने वाले सभी लोग नियमित रूप से गांधी जी की प्रार्थना सभाओं में शामिल हुआ करते थे। 1913 में इस परिसर को सुचारू रूप से चलाने के लिए बापू ने फीनिक्स सेटलमेंट ट्रस्ट की स्थापना की। उनके जाने के बाद 1917 में मनिलाल इसके रेजिडेंट ट्रस्टी बनाए गए। गांधी जी ने यहां 1903 में ही इंडियन ओपिनियन नाम से अखबार शुरू किया और इसके लिए प्रिंटिंग प्रेस भी लगाया। शुरुआत में इसे चार भाषाओं तमिल, हिंदी,गुजराती व अंग्रेजी में प्रकाशित किया गया। बाद में तमिल व ंिहंदी संस्करण बंद कर दिए गए। यह अखबार1961 तक जारी रहा, जिसके बाद प्रेस परिसर में क्लीनिक व क्रेच खोल दिया गया। अक्तूबर 2000 में दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जूमा ने ओपिनियन को दोबारा शुरू कराया। गांधी जी ने सेटलमेंट परिसर में एक स्कूल भी स्थापित किया था। 1985 के दंगों में यह स्कूल भी राख हो गया। इसके बाद सेटलमेंट ट्रस्ट ने पूरे परिसर को नए सिरे से तैयार किया। अब यहां स्मारक के रूप में बापू की विरासत सुरक्षित है।
 लुलु से मिलीं पाटिल
 फीनिक्स सेटलमेंट से निकलने के बाद राष्ट्रपति सीधे डा. जॉन लांगलिबलेले दुबे के घर पहुंची जो अब हेरिटेज स्मारक है। 1871 में पैदा हुए जॉन अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस से संस्थापक व पहले अध्यक्ष थे। गांधी जी के करीबी रहे जॉन का निधन 1946 में हुआ था। वे ओहलैंज इंस्टीट्यूट यहां राष्ट्रपति ने जॉन की बहन लुलु से मुलाकात की, जो इस समय 81 साल की हैं। लुलु ने उन्हें जॉन व बापू से जुड़े कुछ संस्मरण भी बताए। इस मौके पर जॉन की पोती नोलवांडले व तीन पड़पोतियां नोमांजी, नोमंटू व नोबंटू भी मौजूद थीं, जिन्हें राष्ट्रपति ने उपहार भी दिए। राष्ट्रपति ने जॉन का पूरा घर देखा और उनकी कब्र पर फूल भी चढ़ाए।
  

यहां खाकी बदनाम :- नशा तस्करों से मोटी रकम वसूलने वाले सहायक थानेदार और सिपाही नामजद, दोनों फरार

यहां खाकी बदनाम :- नशा तस्करों से मोटी रकम वसूलने वाले सहायक थानेदार और सिपाही नामजद, दोनों फरार एसटीएफ की कार्रवाई में आरोपियों से...