गुरुवार, जून 06, 2013

एक रियासती गांव कलेरां


गांव कलेरां से
जिला नवांशहर का गांव कलेरां किसी वक्त एक रियासत हुआ करती थी। इसे महाराजा रणजीत सिंह के जगीरदार बाबा धर्म सिंह कलेरां ने बसाया था। इस रियासत के किले को किसानों ने धीरे-धीरे खेती की जमीन में तब्दील कर दिया। शेरशाह सूरी मार्ग से दो किलोमीटर की दूरी पर बसा यह रियासत गांव अब महज एक साधारण गांव है। गांव के अधिकतर लोग अपने समृद्ध विरसे से नावाकिफ हैं। लोगों का रहन-सहन काफी अच्छा है। चंद कच्चे मकान छोड़ दें, तो लगभग सभी की आलीशान कोठियां हैं। गांव कलेरां की कुल आबादी १४०० में से ८०० मतदाता हंै। यहां की समूची अर्थव्यवस्था खेतीबाड़ी पर निर्भर है।  पांच फीसदी सरकारी नौकरी कर रहे हैं। गिने-चुने लोग विदेशों में जाकर मेहनत-मजदूरी कर रहे हैं। साक्षरता की दर ८० फीसदी है, जिसमें १०वीं पास अधिक हैं और चंद डबल एमए व ग्रेजुएट हैं। युवाओं का रुझान कंप्यूटर कोर्सों की ओर ज्यादा है।
बुजुर्गों को चाहिए सामाजिक सुरक्षा और पेंशन
गांव की कुल आबादी में 20 फीसदी बुजुर्गों का भी योगदान है। रिटायर बिजनेसमैन गुरबख्श सिंह कहते हैं कि वरिष्ठ नागरिकों को यही उम्मीद है कि आयकर छूट की सीमा बढ़ाई जाए। आजकल बच्चे गुस्से में मां-बाप को घर से निकाल देते हैं, इसलिए उनके लिए सामाजिक सुरक्षा एक अहम पहलू है, इसे और कड़ा किया जाना चाहिए। इसके साथ ही पेंशन भी बढ़ाई जानी चाहिए। सुखबीर सिंह दस साल विदेश में मजदूरी करके यहां वापस आ गए। अब यहां पर वह खेती के साथ अपने पशुओं को संभालते हैं। उन्हें इस बजट में पशुओं के लिए सस्ता चारा चाहिए। करीब आठ महीने पहले जब वह पशुओं के लिए काढ़ा बनाते थे, उसमें केवल ८० रुपये का खर्च आता था, जो अब १९० रुपये में आता है। सरकार इस आसमां छूती महंगाई को हर हाल में कम करे। सुखबीर उम्मीद करते हैं कि सरकार घाटे का बजट पास नहीं करेगी। बिजली और रसोई गैस सस्ती होगी। गैस बुकिंग की अवधि २१ दिन से घटाई जानी चाहिए।
प्रणबदा, कैसे चलेगी रसोई
गृहिणी कुलदीप कौर छह महीने पहले ही यूके से लौटी हैं। गत वर्ष यूके जाने से पहले वह हर महीने दो हजार रुपए का राशन डालती थीं। अब उन्हें हर महीने पांच हजार किराने के लिए और एक हजार रुपये सब्जी के लिए खर्च करने पड़ते हैं। इसके अलावा घर के अन्य सामान के लिए अलग से बजट रखना पड़ता है। इस बढ़ती महंगाई की रफ्तार में उन्हें कपड़े व अन्य सामान की शॉपिंग पर ब्रेक लगानी पड़ी है। उनके बच्चे भी कालेज जाते हैं, तो उन्हें भी पॉकेट मनी अब कम पडऩे लगी है। बस किराये के अलावा कई चीजों के दाम बढ़ गए। कुलदीप के बच्चों के खर्च बेशक जायज और मर्यादित है, लेकिन वह अब चाहकर भी उनकी पॉकेट मनी नहीं बढ़ा पा रही हैं। कुलदीप को बजट में सबसे पहली राहत के रूप में सस्ती दाल और चीनी चाहिए। कुलदीप का दर्द जुबान पर कुछ ऐसे आया,  'गरीबों को नीले कार्ड के जरिए सस्ता राशन मिल रहा है। अमीरों को महंगाई से कोई फर्क नहीं पड़ता। पिसता तो मध्य वर्ग ही है, जो मु_ी भर तनख्वाह में बिना किसी रियायत के घर चलाने के मजबूर है। Ó
राशन सस्ता होगा तभी आएंगे खरीदार
दुकानदार चमन लाल की टीस यही है कि ग्राहक दिल से खरीदारी नहीं कर पा रहा है। दाल और चीनी महंगी होने के चलते उनका मुनाफा बिलकुल ही कम हो गया है। बकौल चमन पांच सदस्यों के परिवार का राशन दो हजार रुपए में आता है, सरकार को इसे घटाकर एक हजार पर लाना चाहिए। चीनी अगर २० रुपए और दाल ४० रुपए प्रति किलो बिकेगी तो उनका भी मुनाफा बढ़ेगा। राशन सस्ता हो जाएगा तो ग्राहक भी खूब आएंगे।
सरपंच जसवीर सिंह कहते हैं कि वैसे उन्हें इस बजट में कोई उम्मीद नहीं है। सरकार हर गांवों में पशु अस्पताल खोलने को तरजीह दे। साथ ही पक्की सडक़ें और सीवरेज भी बनाया जाए। दवाएं सस्ती की जानी चाहिए। किसानों का कहना है कि उनके लिए खेती अब घाटे का सौदा हो चली है, क्योंकि अब इसमें उन्हें कोई बचत नहीं होती है। वे उम्मीद जता रहे हैं कि इस बजट में डीजल और खाद की कीमतें घटाई जाएं। इसके साथ ही उन्हें फसल की उचित कीमत मिलेगी।
दसवीं में सविता मल पंजाब में अव्वल रही थी, वो अब अमेरिका में डाक्टर है। उसके पिता बैंककर्मी सतविंदर कहते हैं कि महंगाई ने हर वर्ग की कमर तोडक़र रख दी है। इस बजट में नौकरी पेशा लोगों को कम से कम पांच लाख रुपये तक आयकर की छूट मिलनी चाहिए। क्योंकि इतने वेतन में आयकर चुकाने के बाद घर का सामान खरीदने और बच्चों की पढ़ाई की जरूरतें पूरी कर पाना संभव नहीं है। अगर सरकार आयकर छूट की सीमा बढ़ाती है, तो कम से एक आम आदमी अपनी रोजाना की जरूरतें आसानी से पूरा कर सकेगा। रेहड़ी लगाने वाले अनोखे लाल कहते हैं कि वह सारा दिन आसपास के गांवों में घूमकर सामान बेचते हैं। कोई साल भर पहले उन्हें रोजाना २०० रुपये की कमाई होती थी, जो अब महंगाई के चलते केवल सौ रुपये रह गई है। अब पूरे परिवार को पालने में रोजाना रसोई पर करीब ७० रुपये खर्च हो जाते हैं, ऐसे में कोई कैसे अच्छी गुजर-बसर की सोच सकता है। सरकार को सबसे पहले महंगाई पर लगाम लगानी चाहिए।
कोई गुड लक निकाले
हैरत की बात यह रही कि कलेरां के अधिकतर युवाओं को बजट के बारे में कोई जानकारी नहीं है, जिसमें कंपनी सैक्रेटरीशिप कर रहा हरदीप सिंह, कंप्यूटर कोर्स कर रही अमनदीप, बीए पास मनजीत जैसे कई युवाओं के नाम शामिल हैं। सेल्समैन परमिंदर बीए पास है, उसे मलाल है कि पढ़ाई करने के बावजूद अच्छी नौकरी नहीं मिली। इस बजट में उसे भी एक बेहतर नौकरी की आस है। डबल एमए सुखविंदर अभी तक बेरोजगार है। उसने बैंक का कोर्स भी कर रखा है, लेकिन नौकरी नहीं मिली। नौकरी नहीं मिलने से कई बेरोजगार युवा नशेड़ी बन रहे हैं।  सुखविंदर कहता है कि यह बजट उसका तभी होगा, अगर युवाओं के लिए कोई गुड लक निकाले और नौकरी के नए स्रोत पैदा किए जाएं।

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